Will you help us hit our goal?

26.2 C
Varanasi
Saturday, September 25, 2021

राम युग के वैभव का परम वैभवशाली प्रस्तुतीकरण: “रामयुग”

“शक्तिशाली मनुष्य वही होता है, जो शक्ति का सही चुनाव कर सके।” विश्वामित्र जब राम से कहते हैं, तो कहीं न कहीं वह राम के माध्यम से हमें भी कोई सन्देश देने का प्रयास करते हैं। कुणाल कोहली द्वारा निर्देशित “राम युग” भी जैसे इसी वाक्य पर चलती है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि यह प्रभु श्री राम की कथा है। उन्हीं प्रभु श्री राम की कथा जो आज तक हमारे जीवन का आधार है। वैसे तो जैसे ही इन दिनों किसी भी ऐसी फिल्म की घोषणा होती है तो हृदय में यह आशंका बलवती हो जाती है कि कहीं फिर से तो कोई एजेंडा नहीं चलाया जा रहा है। क्योंकि न ही उस उद्योग पर विश्वास है और न ही नायकों और नायिकाओं पर।

परन्तु कुछ रिसर्च वर्क की गलतियों या कहें आधुनिक कहलाने की हठ में मूलभूत तथ्यों जैसे राम जी को जनेऊ न धारण करवाना या वनवास के मध्य सीता जी के ललाट पर बिंदी न लगाना, जैसी गलतियों को छोड़ दिया जाए तो एमएक्स प्लेयर पर आने वाली इस सीरीज को देखा जा सकता है एवं विमर्श के कई पहलू लिए जा सकते हैं। क्योंकि कई वर्षों के उपरान्त भारत के भव्य इतिहास को उसकी भव्यता के साथ प्रस्तुत किया गया है। यद्यपि अनगिन रचनात्मक स्वतंत्रता ली गयी हैं, परन्तु मौलिक कथा के साथ छेड़छाड़ नहीं की गयी है, जो सर्वाधिक आवश्यक है। रावण का अतिरिक्त महिमामंडन नहीं है अपितु राम को पहली बार किसी भी धारावाहिक में रावण की तुलना में अधिक बलिष्ठ दिखाया गया है।  प्रभु श्री राम को ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है कि उनकी पीड़ा हमें अपनी पीड़ा लगती है। किसी भगवान की नहीं!

आठ एपिसोड की यह श्रृंखला, राम कथा के बहाने कई नए विमर्श उत्पन्न करती है।  एक दो स्थानों पर संवाद अत्यंत ही शक्तिशाली बन पड़े हैं, जो हमारे समाज को अभी भी दिशा दिखाने के लिए आवश्यक हैं। जैसे जब राम मिथिला की राज सभा में प्रवेश करते हैं तो प्रणाम के उपरान्त कहते हैं कि “महाराज, पहली बार ऐसा सम्राट देखा है जिसकी सभा ज्ञानी,ध्यानियों एवं ऋषियों की सभा है। राजनीतिज्ञों की नहीं।” उसके उपरान्त महाराज जनक कहते हैं कि “राम तुम ऐसे प्रथम व्यक्ति हो जिसने मेरी वास्तविक धन संपदा को पहचाना है। वह भी इतनी कम आयु में।”

“राम युग” राम कथा से कहीं अधिक राम और सीता के प्रेम की कहानी अधिक प्रतीत होती है, क्योंकि अत्यंत सूक्ष्मता से पति एवं पत्नी के उन क्षणों को दिखाया गया है जो हमारे धर्म के प्राण बिंदु हैं। इस कहानी में दाम्पत्य के प्रेम की महिमा है, एवं वह भी हिन्दू दाम्पत्य! जिसमें स्त्री से भी विवाह से पूर्व पूछा गया है कि क्या वह उनके साथ विवाह करना चाहेंगी? इस पूरी कथा में राम एक ऐसे पुरुष के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं, जिनमें शारीरिक बल ही नहीं है, अपितु प्रेम भी है। वह प्रेम जो सीता को प्रथम बार देखने से उत्पन्न हुआ था। वह प्रेम जो सीता जी द्वारा वरमाला डालने के साथ ही एक कर्तव्य के रूप में परिवर्तित हो गया। वह कर्तव्य जो आज भी हर हिन्दू परिवार का आधार है।

अर्थात पत्नी की हर मूल्य पर रक्षा करना! जिसका पालन वह वनवास के दिनों में करते हैं। वह सीता को एक क्षण के लिए भी अकेला नहीं छोड़ते क्योंकि वह जानते हैं कि उनका कर्तव्य अपनी उस पत्नी की रक्षा करना है, जो उनके लिए वन में चली आई है। तो वहीं सीता अपने राम का साथ देने के लिए जब जाती हैं एवं जब रावण उन्हें उठाकर ले जाता है तो बहुत सहजता से वह अपनी गलती स्वीकारती हैं कि मेरे कारण आज मेरे पति और देवर मुसीबत में हैं।

रामयुग में यह मानवीय सहजता ही है, जो इस कथा को और भव्यता प्रदान करती है। यह भावों के स्तर पर भी भव्य है। जब राम स्वर्ण मृग के पीछे सीता जी की हठ के कारण जा रहे हैं तो वह वियोग के भाव, जैसे कि कुछ अनर्थ होने की प्रतीक्षा में है, बरबस ही कह उठता है “अरे राम जी रुक जाओ!” यह निर्देशक की सफलता है। एवं जब मारीच की मृत्यु पर राम और लक्ष्मण एक दूसरे को देखते हैं एवं जैसे दोनों ही उस अनर्थ को अनुभव करते हैं, वह दृश्य अद्भुत फिल्माया गया है।

राजा राम ने यह बतलाया कि वन में रहते हुए भी राजा थे, वह सीमा में बंधे हुए राजा नहीं थे, क्योंकि सीमा में बंधे हुए राजा अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर पाते।” जैसे सूत्रधार के संवाद इस पूरी श्रृंखला को और अधिक भव्य बनाते हैं। और “लक्ष्मण जैसा भाई पाने के लिए व्यक्ति को राम जैसा होना पड़ेगा।” जैसे अनेक संवाद हैं, जो आपको बार बार सोचने के लिए प्रेरित करते हैं, मूल्य अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। “राम कभी अपने कर्तव्य में भागता नहीं है, मेरा विश्वास है, इस विनाशलीला में राक्षस पक्ष अपने अत्याचारों का दंड अवश्य पाएगा।”  जैसे संवाद जब राम एवं रावण के मध्य संघर्ष के संवाद तक पहुँचते हैं तो तमाम विमर्श को एक नया रूप देते हैं। वही भरत को शासन समझाते समय एक नए ही रूप में वह हिन्दू विमर्श उभर कर आता है जिसके राजतंत्र में जनता का मत ही मुख्य था, जनता का हित ही मुख्य था, राजतंत्र में राजा सेवक था एवं जनता स्वामी!

हाल ही में कथित वामपंथी बौद्धिकों का एक नया ही संवाद हर दशहरे पर आता है कि “रावण ने सीता के साथ कुछ गलत नहीं किया, मर्यादा भंग नहीं की!” तो इसमें अंत में राम एवं रावण के मध्य संवाद बहुत रोचक दिखाया है एवं इन कथित लिबरलों के प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं। जब रावण कहता है कि रावण सोच नहीं एक विचार है। तो राम का कहना है रावण एक सोच है, एक दुर्बलता तो राम एक शक्ति है। रावण कहता है मैंने मर्यादा भंग नहीं की सीता की तो राम कहते हैं कि सीता ने नहीं करने दी।

फिर रावण कहता है कि आने वाले समय में स्त्री अपने युगों के रावणों से सुरक्षित नहीं रहेगी, कोई मर्यादा नहीं शेष रहेगी मर्यादा पुरषोत्तम! इस पर राम कहते हैं कि भारत की स्त्री किसी भी रावण से अपनी रक्षा स्वयं कर सकती है। जब रावण धर्म की पराजय की बात करता है तो राम कहते हैं कि धर्म न ही इस युग के रावण से पराजित हुआ है और न कभी होगा और इसी के साथ उस प्रोपोगैंडा प्रश्न का भी उत्तर देते हैं जो आजकल हर जगह फैला होता है कि रावण का पुतला तो जला दिया अपने भीतर का रावण कैसे मारोगे? इस पर राम का उत्तर है चाहे बाहर का रावण हो या भीतर का रावण, उसे अंत में जलना ही होगा। राम कहते हैं कि हर युग राम युग होगा क्योंकि हर युग अपने युग के रावण से लड़ने के लिए अपना राम स्वयं पैदा करेगा।“

कुछ रिसर्च वर्क की गलतियों के बावजूद यह फिल्म जब राम और सीता को एक साथ योग एवं ध्यान करते हुए दिखाती है तो कहीं न कहीं वह प्रोपोगैंडा फिल्म द ग्रेट इंडियन किचन के उस दृश्य को एकदम से स्मृति से धुंधला कर देती है जिसमें स्त्री रसोई में और पुरुष को ध्यान और योग करते हुए दिखाया जाता था।

और साथ ही राम एवं सीता के सहज प्रेम के एवं साहचर्य के दृश्य है वह उन तमाम विमर्शों पर भारी पड़ते हैं, जो आज तक फेमिनिस्ट गाती हुई आई थीं कि स्त्री को गुलाम माना जाता था आदि आदि!  यह श्रृंखला अनजाने में ही कई विमर्शों का उत्तर देती है एवं राम एवं सीता के युगल प्रेम की ऐसी भव्य गाथा प्रस्तुत करती है जिसकी आवश्यकता इस समय सबसे अधिक है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम, व्यायाम करते हुए राम, कुटिया बनाते हुए राम, एवं सीता के साथ ठहाके लगाते हुए राम! सीता के वियोग में रोते हुए राम! एकदम सहज राम, अपने धनुष के तीर नुकीले करते हुए राम! संक्षेप में वह राम जो सभी के हृदय में बसे हुए हैं!

यह श्रृखंला राम के प्रेम की भव्यता तो है ही राम के प्रति प्रेम की भी भव्यता है!


क्या आप को यह  लेख उपयोगी लगा? हम एक गैर-लाभ (non-profit) संस्था हैं। एक दान करें और हमारी पत्रकारिता के लिए अपना योगदान दें।

हिन्दुपोस्ट अब Telegram पर भी उपलब्ध है. हिन्दू समाज से सम्बंधित श्रेष्ठतम लेखों और समाचार समावेशन के लिए  Telegram पर हिन्दुपोस्ट से जुड़ें .

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest Articles

Sign up to receive HinduPost content in your inbox

We don’t spam! Read our privacy policy for more info.