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Friday, January 21, 2022

मुनव्वर फारुकी: नफरत तब जीती थी जब कॉमेडी के नाम पर गोधरा में जलते हिन्दुओं का मजाक उड़ाया था, और बजी थी तालियाँ

मुन्नवर फारुकी इन दिनों फिर से चर्चा में हैं और इस बार वह सहानुभूति पाने के लिए चर्चा में हैं। मुन्नवर फारुकी का एक शो बंगलुरु में होना था, जिसे निरस्त कर दिया गया और फिर मुनव्वर फारुकी ने लिखा कि नफरत जीत गयी, आर्टिस्ट हार गया,

मैं हार गया, अलविदा अन्याय

मुनव्वर फारुकी दो महीने में अपने बारह शो कैंसल होने से दुखी हैं और इस बात से दुखी हैं कि उनके साथ ऐसी नफरत की जा रही है! दरअसल बंगलुरु पुलिस ने उनके हाल ही के आयोजन को रद्द करवा दिया था क्योंकि उस शो से कानून व्यवस्था में समस्या आ सकती थी!

पर एक बात तो समझनी होगी कि मुनव्वर किस नफरत की बात कर रहे हैं? और यह नफरत उनके साथ ही क्यों कोई कर रहा है? प्रकृति का एक नियम होता है, कि जो आप देते हैं, वही आपके पास वापस आता है।  और एक कलाकार समाज को क्या देता है? एक कलाकार समाज को सृजनात्मकता देता है, आनंद देता है और उल्लास देता है।  

मुनव्वर एक स्टैंडअप कॉमेडियन हैं! जिसका मूल कार्य है लोगों के जीवन में हास्य प्रदान करना।  और जब तक मुनव्वर यह करते हैं, तब तक वह कलाकार हैं, परन्तु जब वह अपनी हिन्दू घृणा को हास्य के रस में लपेटकर प्रस्तुत करते हैं, वैसे ही वह कलाकार से हटकर और कुछ हो जाते हैं।  

एक वीडियो है मुनव्वर का जिसमें वह एक ऐसी घटना का मजाक उड़ा रहे हैं, जो घटना हर हिन्दू के लिए पीड़ा से भरी घटना है।  उस घटना में कई लोग मर गए थे, या कहें मारे गए थे।  जिसका दोषी हाजी बिलाल हाल ही में अपनी मौत को प्राप्त हुआ है।  

उसका गुनाह यह था कि उसने अपने साथियों के साथ मिलकर 27 फरवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस का एस 6 कोच जलाया था।  और उस कोच में अयोध्या से कारसेवक लौट रहे थे।  उस दिन उस आग में 59 लोग जलकर मारे गए थे।

वह क्यों मारे गए थे? वह उसी घृणा का शिकार हुए थे, जो घृणा मुनव्वर के दिल में हिन्दुओं के प्रति है जब वह गोधरा की घटना का उल्लेख “द बर्निंग ट्रेन” कहते हुए करते हैं? यह वही घृणा थी, जो मुन्नवर का समर्थन करने वाले हर मुस्लिम और वोक लोगों के दिल में हिन्दुओं के प्रति है।  

गोधरा काण्ड - विकिपीडिया

मुनव्वर जी, जब आप 59 लोगों के जलती हुई देह की पीड़ा को महसूस न करते हुए, उनकी इस पीड़ा का उपहास उड़ाते हैं न, वह नफरत होती है! नफरत वह होती है जब आप उन लोगों की पीड़ा पर हँसते हैं, जो अपने आगे मृत्यु देख रहे थे, और अपनी देह का एक एक अंग जलते हुए गिरते देख रहे थे! नफरत वह होती है जब आप जिंदा देहों को लाशों में बदले हुए हिन्दुओं पर हँस रहे थे! नफरत वह होती है मुन्नवर फारुकी जी, जब आप सैकड़ों सपनों के असमय जल जाने पर अपनी वही मजहबी हँसी हँसते हैं, जो सदियों के हमारे घावों पर नमक बुरकाती है!

नफरत वही होती है मुनव्वर फारुकी!

खैर जब से मुनव्वर फारुकी ने ऐसी पोस्ट लिखी तब से लोग उनके समर्थन में आ गए, बीबीसी से लेकर बरखा आदि आदि सभी उनके पक्ष में आ गए।  आना भी चाहिए! अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं समाप्त होनी चाहिए।  

कमलेश तिवारी के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं थी?

मुनव्वर फारुकी हों, मुन्नवर राणा हो या फिर एमएफ हुसैन हों, या फिर हाल ही में सलमान खुर्शीद हों।  इन सभी के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, और बहुत अधिक है।  यहाँ तक कि न्यायालय भी कह देते हैं कि आपको ठीक नहीं लग रही तो न पढ़ें!

परन्तु यही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता न ही कमलेश तिवारी के लिए है और न ही वसीम रिजवी के लिए! कमलेश तिवारी का अपराध क्या था? कमलेश तिवारी ने कुछ आपत्तिजनक बोला था, और उस कारण उन पर रासुका तक लग गया था, वह जेल में रहे थे और अंत में इस्लामी कट्टरपंथियों के हाथों वह मारे गए थे।  उस दिन किसकी हार हुई थी?

Kamlesh Tiwari | विवादों से गहरा नाता रहा है कमलेश तिवारी का, पैगंबर पर की  थी अभद्र टिप्पणी
कमलेश तिवारी

खैर! इस्लाम की कट्टरता के खिलाफ लिखने वाली बांग्लादेश की लेखिका तसलीमा नसरीन पर जब तब फतवे जारी होते रहते हैं, पर लिब्रल्स के लिए उनकी भी अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है,

हाल ही में अभिव्यक्ति की आजादी के हनन का एक बहुत बड़ा मामला सामने आया था, परन्तु उस पर लिब्रल्स की आवाज नहीं आई थी।  वह मामला क्या था? वह मामला था एक ऐसे विषय पर बनी फिल्म को सेंसर बोर्ड द्वारा प्रदर्शित होने की अनुमति न देना, जिसे न्यायालय की ओर से प्रदर्शित करने की अनुमति मिल गयी थी! यह फिल्म थी “लव जिहाद” पर बनी फिल्म!

पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकार यह नहीं बोले कि यह गलत हो रहा है!

यहाँ कौन हार रहा है मिस्टर मुनव्वर?

तब कौन जीता था मिस्टर मुनव्वर जब यति स्वामी नरसिम्हानन्द सरस्वती जी के खिलाफ नारे लग रहे थे कि “गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा!”

यह जीतना और हारना इतना सिलेक्टिव क्यों होता है मुनव्वर फारुकी जी?

और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तब कहाँ गयी थी जब ब्लूम्सबरी जैसे प्रकाशक ने दिल्ली दंगों पर एक तथ्यपरक पुस्तक को प्रकाशित करने के बाद इंकार कर दिया था? यह सब एक तरफ़ा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्यों?

पीड़ित कार्ड खेलना बंद किया जाए:

मुनव्वर फारुकी जैसों को अब यह समझना होगा कि हर बार उन्हें पीड़ित होने का रोना बंद करना होगा।  ऐसा कैसे हो सकता है कि आप हिन्दुओं की सीता माता पर अभद्र टिप्पणी करे और उनके प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग करें, हिन्दुओं के आराध्य राजा राम के प्रति घृणा का प्रदर्शन करे और भाई के प्रति असीम प्रेम करने वाले लक्ष्मण के लिए अश्लील भाषा एवं हावभाव प्रदर्शित करें और हिन्दू आपका विरोध भी न करे? यह कैसी बेशर्मी है आपकी और आपके पैरोकारों की?

जो आप लोगों ने नफरत फैलाई है, वही आपको वापस मिल रही है? यह जो पीड़ित होने का रोना रो रहे हैं आप, वह इसलिए क्योंकि आम हिन्दू आपकी जालसाजी समझता है।  किसी को भी किसी नेता के साथ की जा रही कॉमेडी से कोई मतलब नहीं होता, परन्तु हिन्दुओं के आराध्य प्रभु श्री राम, माता सीता के प्रति ऐसी अपमानजनक भाषा प्रयोग करते हुए आपको शर्म नहीं आई थी और आपको अपनी उस नफरत पर शर्म आई होगी जो गोधरा को “बर्निंग ट्रेन” कहते हुए निकली थी!

जारी है पिछड़े और मजहबी लिब्र्लस का भडकाऊ रोना

मुन्नवर फारुकी द्वारा पोस्ट लिखे जाने के बाद लिब्रल्स का रोना चल रहा है।  और हिन्दू धर्म को पिछड़ा बताते हुए भड़काया जा रहा है।  सबा नकवी ने लिखा कि

मुनव्वर को पंजाब जाना चाहिए और वहां पर परफॉर्म करना चाहिए।  उसका स्वागत होगा और उसकी रक्षा होगी और फिर लिखा #jaikisan

अब इसमें यह हैरान करने वाली बात है कि इसमें पंजाब और किसान कैसे और कहाँ से आया? क्या पंजाब की सरकार हिन्दू विरोधी तत्वों को आधिकारिक सहायता प्रदान करेगी? यह सोचने योग्य है एवं जैसे हिन्दुओं की पीड़ा गोधरा काण्ड पर मुनव्वर ने मजाक उड़ाया है, क्या वह 1984 के सिख नरसंहार पर उठा सकते हैं और क्या सबा यह अपेक्षा करेंगी कि हमारे सिख भाई इस पर ताली बजाएँगे?

यह आने वाला समय बताएग!

एक यूजर ने कहा भी पंजाबियों का हास्य बोध अच्छा है, परन्तु वह जलियावाला बाग़ पर मजाक नहीं बनाते?

परन्तु यहाँ पर किसान का उल्लेख क्यों किया, यह समझ नहीं आया?

और कांग्रेस क्यों प्रभु श्री राम का अपमान करने वाले के साथ आ आरही है, यह समझ नहीं आ रहा है, वह भी तब जब राहुल और प्रियंका दोनों ही सच्चे हिन्दू बने घूम रहे हैं:

एक बात समझ में अब लिब्रल्स को आ जानी चाहिए कि हिन्दुओं के भगवान किसी सस्ते कॉमेडियन के द्वारा मजाक बनाए जाने के लिए नहीं हैं, और यह विक्टिम कार्ड खेलना बंद करना होगा कि मुस्लिम होने के नाते उन्हें निशाना बनाया जा रहा है, उनका विरोध इसलिए हो रहा है क्योंकि वह हिन्दुओं के आराध्यों पर अपमानजनक टिप्पणी कर रहे हैं, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में हिन्दू आस्था का अपमान करना नहीं आता है।  

वोक हिन्दुओं के अतिरिक्त इस प्रकार के विक्टिम जाल में सहज हिन्दू नहीं आएगा, यह स्पष्ट होता जा रहा है और राणा अयूब जैसों को भी समझ में आ जाना चाहिए कि मुस्लिम कार्ड वह नहीं खेल पाएंगी क्योंकि यदि कॉमेडी किसी आराध्य के उपहास से नहीं बनती, यदि बनती है तो वह क्या यह कॉमेडी पैगम्बर मोहम्मद के प्रति कर सकते हैं?

इसी प्रश्न में सभी वोक्स के उत्तर छिपे हैं:

हिन्दू भी मुनव्वर फारुकी सहित सभी वोक्स और कट्टरपंथी मुस्लिम प्रगतिशीलों से कह रहे हैं

“बहुत हुआ, नफरत जीत गयी!”

क्योंकि कमलेश तिवारी का चेहरा अभी तक सामने आ ही जाता है!, और गोधरा में जलते हुए शरीर और चीखें आज तक सिहरा देती ही हैं! कश्मीरी हिन्दुओं की पीड़ा तो समझ ही नहीं सकते हैं यह वोक्स और कट्टर मुस्लिम प्रगतिशील!

बहुत हुआ, नफरत छोड़िये!

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