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Sunday, September 19, 2021

डॉ. भीम राव आंबेडकर और इस्लाम के प्रति उनके विचार

कल बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर जी की जन्मतिथि पर पूरा देश उनको याद कर रहा था। जो देश अपने नायकों को स्मरण करता है वह देश सदा आगे बढ़ता है, एवं सम्पूर्ण विश्व पर एक प्रकार से शासन करता है। तभी राष्ट्रनायकों का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण है। बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर भी ऐसे ही एक नायक हैं, जिनका आदर आज पूरा देश करता है। इस्लाम के अनुयायी इन दिनों आंबेडकर जी की पूजा करते हैं, पर कई बार उन्हें भी आंबेडकर जी को पढ़ना आवश्यक हो जाता है। कई बार मिथक भी टूटते हैं।

डॉ. भीम राव आंबेडकर द्वारा लिखी गयी कई पुस्तकों में से एक पुस्तक है ‘Thoughts on Pakistan’ (पाकिस्तान पर विचार), उसमें वह कई तथ्य प्रस्तुत करते हैं, इन्हीं में से एक तथ्य यह है कि वह इस्लामी आक्रान्ताओं पर मुखर होकर बोले हैं। वह कहते हैं कि “मुस्लिम आक्रान्ता हिन्दुओं के खिलाफ नफरत का राग ही गाने के लिए आए थे। मगर उन्होंने केवल नफरत का राग ही नहीं गाया और वह केवल रास्ते के मंदिरों का विध्वंस करते हुए ही वापस नहीं गये, जो कि एक वरदान हो सकता था। वह अपने लिए इतना नकारात्मक परिणाम नहीं चाहते थे। उन्होंने एक कार्य किया कि उन्होंने इस्लाम का पौधा बो दिया और वह कोई छोटा मोटा पौधा न होकर अब एक विशाल वृक्ष बन चुका है कि उत्तर भारत में अब हिन्दू और बौद्ध संस्कृति छोटी मोटी झाड़ियाँ हैं।”

इसके आगे वह कहते हैं कि “हिन्दू पाकिस्तान और हिन्दुस्तान में कैसी एकता खोजते हैं? यदि यह भौगोलिक एकता है तो यह कोई एकता नहीं है क्योंकि यह एकता प्रकृति से जुड़ी हुई होती है।”

इसी पुस्तक में पृष्ठ 91-92 में वह पाकिस्तान का समर्थन करने वाले वर्ग की मजहब आधारित मानसिकता को व्यक्त करते हैं। उनके अनुसार इनके लिए मजहब देश से बढ़कर है। इसका उदाहरण भी वह देते हैं। वह इतिहास में तमाम उदाहरणों को लेकर लिखते हैं

“Taking note of all these considerations, there can be very little doubt that he would be a bold Hindu, who would say that in any invasion by Muslim countries, the Muslims in the Indian  Army would be loyal and that there is no danger of their going over to the invader.

Even Theodore Morison*, writing in 1899, was of the opinion that “The views held by the Mahomedans (certainly the most aggressive and truculent of the peoples of India ) are alone sufficient to prevent the establishment of an independent Indian Government.

Were the Afghan to descend from the north upon an autonomous India, the Muhamedans, instead of uniting with the Sikhs and Hindus to repel him, would be drawn by all the ties of kinship and religion to join his flag”.

And when it is recalled that in 1919 the Indian Musalmans who were carrying on the Khilafat movement actually went to the length of inviting the Amir of Afghanistan to invade India, the view expressed by Sir Theodore Morison acquires added strength and ceases to be a mere matter of speculation.

उपरोक्त पंक्तियों में वह स्पष्ट लिखते हैं कि इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए,  इस विषय में तनिक भी संदेह नहीं है कि शायद ही कोई ऐसा हिन्दू होगा जो निसंकोच यह दावा करेगा की किसी भी मुस्लिम देश से भारत पर आक्रमण होने पर भारतीय सेना में मुस्लिम निष्ठावान रहेंगे, और इस बात का खतरा नहीं होगा कि वह आक्रमण करने वाले के पक्ष में खड़े नहीं हो जाएंगे!

उन्होंने थियोडोर मोरिसन को भी उद्घृत करते हुए उनके द्वारा 1899 में लिखी यह बात कही, “निश्चित ही भारत के सबसे उग्र एवं लड़ाकू लोग, मोहम्मडन (मुस्सलमान), की सोच एक स्वतंत्र भारत सरकार की स्थापना को रोकने के लिए काफी है। अगर उत्तर से अफ़ग़ानों ने ऐसे स्वशासी भारत पर आक्रमण किया तो सिखों और हिन्दुओं के साथ मिलकर उन्हें पीछे खदेड़ने की बजाय मोहम्मडन अपने मज़हब की वजह से अफ़ग़ानों का साथ देने के लिए बाध्य हो जाएंगे।”

और वह इस बात को भी कहते हैं कि वर्ष 1919 में भारतीय मुसलमानों ने, जो खिलाफत आन्दोलन का संचालन कर रहे थे, उन्होंने अफगानिस्तान के अमीरों से अनुरोध किया था कि वह भारत पर आक्रमण करें जिससे मोरिसन की सोच की पुष्टि होती है। वह अगले पृष्ठ पर लिखते हैं कि सेना में मुस्लिमों का होना, अर्थात हिन्दू उनके लिए भुगतान तो करेंगे परन्तु आवश्यकता के समय वह उन्हें प्रयोग नहीं कर सकेंगे क्योंकि उनकी निष्ठा संदिग्ध है।

साम्प्रदायिक हिंसा पर बात करते हुए पृष्ठ 111 पर उन्होंने लिखा है कि इसे स्वीकार किया जाना चाहिए कि पाकिस्तान के निर्माण से हिन्दुस्तान साम्प्रदायिक प्रश्न से मुक्त नहीं हो जाता। उन्होंने लिखा है कि भारत में मुसलमान पूरे देश में इधर उधर फैले हुए हैं तथा जब तक जनसँख्या का आदानप्रदान नहीं हो जाता, तब तक हिन्दुस्तान में बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक की समस्या रहेगी।

आज जब हम वर्तमान परिप्रेक्ष्य को देखते हैं तो पाते हैं कि कई प्रवृतियां आज भी उसी मानसिकता की जीवित हैं एवं स्पंदित हो रही हैं, जो विभाजन के लिए उत्तरदायी थीं।  आज भी कई इस्लामी चरमपंथी हैं, जो इस उम्मीद में हैं कि विश्व के 57 इस्लामी देश एक दिन जरूर ही हिन्दुस्तान पर हमला करेंगे!

और यह भी बात डॉ. भीम राव आंबेडकर की एकदम उचित है कि जब तक सम्पूर्ण जनसँख्या का आदानप्रदान नहीं हो जाएगा तब तक बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक वाद से भारत को छुटकारा नहीं मिलेगा। आज भारत वास्तविकता में अल्पसंख्यकवाद से सबसे ज्यादा जूझ रहा है, भारत सच में इसका शिकार है।


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