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Friday, April 12, 2024

उच्चतम न्यायालय का फरमान: अंतिम निर्णय आने तक मंदिर में दुकानों की नीलामी प्रक्रिया में भाग ले सकते हैं गैर हिन्दू!

शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय ने मुस्लिम याचिकाकर्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए निर्णय दिया कि आंध्र प्रदेश में कुन्नूर में श्रीशैलममंदिर में मंदिर के लिए दुकानों की नीलामी प्रक्रिया में भाग लेने से गैर हिन्दुओं को नहीं रोका जा सकता है. जस्टिस चंद्रचूड और जस्टिस ए एस बोपन्ना की बेंच ने याचिकाकर्ता सैय्यद जानी बाशा की जीने के अधिकार की याचिका पर यह निर्णय सुनते हुए कहा कि जब तक उच्चतम न्यायालय इस विषय में अंतिम निर्णय नहीं दे देता है, तब तक मंदिर में दुकानों की नीलामी प्रक्रिया में भाग लेने से किसी भी गैर हिन्दू को न रोका जाए!

क्या है मामला?

वर्ष 2015 में आंध्रप्रदेश सरकार ने उक्त नीलामी प्रक्रिया में गैर हिन्दुओं का भाग लेना प्रतिबंधित कर दिया था. जब इस निर्णय के विरोध में वर्ष 2019 में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गयी थी तो उसे खारिज कर दिया गया था. परन्तु अब उच्चतम न्यायालय ने आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय के वर्ष 2020 के निर्णय पर रोक लगा दी है. याचिकाकर्ता सैय्यद जानी बाशा ने यह आरोप लगाते हुए एक कंटेम्प्ट याचिका दायर की थी कि आन्ध्र प्रदेश सरकार और मंदिर के अधिकारी माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेशों का सम्मान नहीं कर रहे हैं.

जस्टिस चंद्रचूड ने कहा

“मंदिर परिसर में आप यह तो कह सकते हैं कि शराब न पी जाए, या फिर जुआ आदि न खेला जाए परन्तु आप यह कैसे कह सकते हैं या यह कैसे निर्धारित कर सकते हैं कि यदि कोई हिन्दू धर्म का नहीं है तो वह बांस, फूल या बच्चों के खिलौने नहीं बेच सकता है.”

जस्टिस चंद्रचूड़ और एएस बोपन्ना की पीठ एसएलपी (स्पेशल लीव पेटिटन) में दायर एक अवमानना ​​याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जहां शीर्ष अदालत ने जनवरी, 2020 में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के सितंबर, 2019 के फैसले पर रोक लगा दी थी। वर्ष 2015 में आंध्र प्रदेश राज्य द्वारा जारी किए गए सरकारी आदेश में गैर-हिंदुओं को दुकानों की नीलामी में भाग लेने से प्रतिबंधित कर दिया था.

मूल सरकारी अधिसूचना में एपी चैरिटेबल और हिंदू धार्मिक संस्थानों के नियम 4 (2) और नियम 18 और बंदोबस्ती अचल संपत्ति और अन्य अधिकार (कृषि भूमि के अलावा) पट्टों और लाइसेंस नियम, 2003 को शामिल किया गया था, जिसके अंतर्गत गैर-हिंदुओं को दुकानों की निविदा-सह-नीलामी प्रक्रिया में भाग लेने पर रोक लगाई गयी थी या फिर उनपर यह रोक लगाई गयी थी कि वह प्रतिवादी संख्या 3-मंदिर से जुडी हुई अचल संपत्ति में किसी व्यापार को करने के लिए लाइसेंस ले सकते हैं या फिर पट्टा ले सकते हैं/

याचिकाकर्ता सैय्यद जानी बाशा ने आंध्र प्रदेश सरकार के राजस्व विभाग के प्रधान सचिव, बंदोबस्ती के आयुक्त और श्री ब्रमरम्बा मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर के कार्यकारी अधिकारी के विरुद्ध न्यायालय की अवमानना ​​की कार्रवाई की मांग की।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने प्रतिवादियों- संबंधित राज्य के अधिकारियों और मंदिर प्रबंधन के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. वैद्यनाथन से कहा, “जब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया जा रहा है, तब तक आपको सभी पूर्ववर्ती किरायेदारों और उन सभी को आवंटन करना होगा जो हक़दार हैं, फिर उनका धर्म कोई भी हो।”

इसके बाद पीठ ने अपना आदेश सुनाया-

“हमने याचिकाकर्ताओं के वकील और प्रतिवादियों के वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. वैद्यनाथन को सुना है। इस न्यायालय के दिनांक 27 जनवरी 2020 के एक आदेश द्वारा एक रिट याचिका पर आंध्र प्रदेश के उच्च न्यायालय के दिनांक 27 सितंबर 2019 के निर्णय पर रोक लगा दी गई थी। उसके उपरान्त अवमानना ​​याचिका में इस अदालत का दिनांक 8 फरवरी 2021 का आदेश आया था। उपरोक्त आदेशों के आलोक में सरकार और मंदिर अधिकारियों के लिए यह अनिवार्य है कि वह धर्म के आधार पर किसी भी लाइसेंस धारक पर प्रतिबन्ध न लगाएं।

धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिन्दू नियंत्रण और विरोध

भारत में मात्र हिंदू धार्मिक संस्थान ही धर्मनिरपेक्ष राज्य के नियंत्रण में आते हैं, और इन सरकार नियंत्रित मंदिरों के प्रबंधन में अधिकांशतया भ्रष्टाचार और अक्षमता दिखाई देती है। यह देखा गया है कि तेजी से, गैर-हिंदू सरकार द्वारा नियंत्रित मंदिरों में, या मंदिर दान के माध्यम से वित्त पोषित संस्थानों में रोजगार की मांग कर रहे हैं।

अल्पसंख्यकों के मजहबी संस्थान हर प्रकार के सरकारी नियंत्रण से मुक्त होते हैं। केवल मुस्लिम वक्फ बोर्ड में ही कुछ सरकारी भागीदारी है फिर भी वहां पर भी  केरल सरकार ने जब यह कहा था कि केरल लोक सेवा आयोग (केपीएससी) के माध्यम से वक्फ बोर्ड के कर्मचारियों की नियुक्ति की जाएगी तो यह अवराह फ़ैल गयी थी कि इससे गैर-मुसलमान वक्फ बोर्ड के कर्मचारी बन जाएंगे, और इसी कारण उसे विरोध का सामना करना पड़ा था।

यह बहुत ही अजीब बात है कि जहाँ पूरे विश्व में, धर्मनिरपेक्षता का अर्थ चर्च (धार्मिक संस्थानों) और राज्य को अलग करना है तो वहीं भारत के धर्मनिरपेक्ष गणराज्य में, इसका अर्थ है राज्य द्वारा हिंदू धार्मिक संस्थानों का नियंत्रण।

भारत के अतिरिक्त किसी अन्य लोकतंत्र में, सरकारें पूजा स्थलों या धार्मिक निकायों द्वारा प्रबंधित संस्थानों पर नियंत्रण नहीं रखती हैं; उनके साथ किसी अन्य निजी संगठन की तरह ही व्यवहार किया जाता है। लेकिन भारत में, प्रमुख मंदिर अब लगभग सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों की तरह हो गए हैं, जिनमें धार्मिक विधि विधान वाले हिन्दुओं का कोई स्थान नहीं है।

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