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Saturday, January 22, 2022

दिल्ली उच्च न्यायालय ने खारिज की एनसीईआरटी पुस्तकों से मुगलों के मंदिरों को दान देने वाले भ्रामक दावे हटाने वाली याचिका

भारत के अधिकांश मंदिरों को मुस्लिमों के आरम्भ से ही विध्वंस का सामना करना पड़ा था और यह सब एक नहीं बल्कि कई पुस्तकों में लिखा है। उस समय के यात्रियों के रिकार्ड्स को भी यदि देखा जाए तो पता चलेगा कि कितने मंदिरों को तोड़ा गया है। इनका सारा विवरण सीताराम गोयल की पुस्तक HINDU TEMPLES, WHAT HAPPENED TO THEM में सविस्तार दिया गया है।

परन्तु फिर भी एनसीईआरटी में बच्चों को यह झूठ पढ़ाया जा रहा है कि हिन्दुओं के मंदिरों का निर्माण मुगलों ने किया था। यह अत्यंत आपत्तिजनक था क्योंकि यह सत्य से कोसों दूर है। थीम इन इंडियन हिस्ट्री भाग II में मुग़ल शासकों शाहजहाँ और औरंगजेब के विषय में गलत दावे किए गए हैं, और उन्हीं हिस्सों को दूर करने के लिए न्यायालय में याचिका दायर की गयी थी, जिसे दिल्ली उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया।

दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय पर इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार

  1. मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायाधीश jyotiज्योति सिंह ने याचिका को समय की बर्बादी बताते हुए कहा कि इसे खारिज किया जाए नहीं तो दंड लगेगा।बाद में याचिकाकर्ता ने उस याचिका को आर्थिक दंड के चलते वापस ले लिया।

बेंच ने कहा कि “आप कहना चाहते हैं कि आपको यह समस्या है कि शाहजहाँ और औरंगजेब की मंदिर की दान के सम्बन्ध में कोई नीति नहीं थी। हम यहाँ पर यह निर्धरित नहीं कर पा रहे हैं कि केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियाँ सही हैं या नहीं, और आपको इतिहास की नीतियों को लेकर समस्या है! आप चाहते हैं कि हम शाहजहाँ और औरंगजेब की नीतियों को तय करें? उच्च न्यायालय यह तय करेगा क्या?

यह गौर करने लायक है कि भारत की अधिकांश निर्णय लेने वाली संस्थाओं को मुगलों से प्रेम है और बार बार गाहे बगाहे यह प्रेम परिलक्षित होता रहता है। हिन्दुओं के प्रति कहीं न कहीं एक सौतेला व्यवहार भी दिखाई देता रहता है। और वह लोग भी शिक्षा के उस झूठ को ही सच माने बैठे हैं, जो मुग़ल काल को, जो हिन्दुओं के लिए सबसे बुरा काल था, जब उन्हें अपने धर्म का पालन करने का अधिकार भी बामुश्किल था, उसे भारतीय इतिहास का स्वर्ण काल कहा जाता है। यही झूठ बच्चों को औपचारिक रूप से पढ़ाया जाता है।

हालांकि यह इस सरकार की सबसे बड़ी नाकामी है कि इतिहास की पुस्तकों को लिखने वाले वही रहे, जिन्होनें जानते बूझते विकृत इतिहास लिखा था हमने अपने लेखों में इस बात को उठाया था कि एनसीईआरटी में बच्चों के लिए स्कूल की पुस्तकों की पिछली सलाहकार समिति में विष बुझे लोग अभी तक क्यों है?

और इतने वर्षों के बाद भी इतिहास की पुस्तकों पर कार्य क्यों नहीं हुआ, यह भी विचारणीय है!

न्यायालय भी स्वयं मानते हैं कि अतीत में गलत हुआ है

ऐसा नहीं है कि न्यायालय को यह नहीं पता है कि अतीत में क्या हुआ है और क्या गलत हुआ है? हाल ही में दिल्ली की ही एक अदालत ने यह कहते हुए कुतुबमीनार परिसर में पूजा करने की याचिका खारिज कर दी थी कि अतीत में की गयी गलतियों के आधार पर वर्तमान और भविष्य की शांति भंग नहीं कर सकते हैं।

क्या था याचिका में

याचिका में यह आरोप लगाया गया था कि वर्ष 1198 में मुगल सम्राट कुतुब-दीन-ऐबक के शासन में लगभग 27 हिंदू और जैन मंदिरों को अपवित्र और क्षतिग्रस्त कर दिया गया था, उन मंदिरों के स्थान पर उक्त मस्जिद का निर्माण किया गया था।“

यह सत्य है और इसका उल्लेख आधिकारिक रिकार्ड्स में उपलब्ध हैं, हालांकि इस के सम्बन्ध में भी एनसीईआरटी ने अपनी इतिहास की पुस्तक में यह दावा किया था कि इस मीनार को दो सुल्तानों कुतुबुद्दीन ऐबक और इल्तुतमिश ने बनाया था।

परन्तु जब नीरज अत्री ने इस सम्बन्ध में सूचना के अधिकार के अंतर्गत यह जानकारी माँगी थी कि इस बात के क्या प्रमाण हैं कि यह मीनार इन दोनों ने बनाई है तो इस सम्बन्ध में एनसीईआरटी का उत्तर था कि इस सम्बन्ध में कोई तथ्य नहीं है!

इसी के विषय में आगरा विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफ़ेसर ए। एल श्रीवास्तव  द्वारा लिखी गयी किताब THE SULTANATE OF DELHI में यह लिखा गया है कि कुतुबुद्दीन ऐबक ने यह मस्जिद हिन्दू मंदिरों को तोड़कर बनवाई थी

इसी तथ्य को Introduction of Indian Architecture में इस प्रकार लिखा है

न्यायालय को अतीत की गलतियाँ पता हैं, परन्तु न्याय नहीं है?

क़ुतुबमीनार को मंदिर मानते हुए पूजा करने की याचिका पर सिविल जज नेहा शर्मा ने कहा था

“भारत का सांस्कृतिक रूप से समृद्ध इतिहास रहा है। इस पर कई राजवंशों का शासन रहा है। तर्कों के दौरान, वादी के वकील ने राष्ट्रीय शर्म के मुद्दे पर जोरदार तर्क दिया। हालांकि किसी ने भी इनकार नहीं किया है कि अतीत में गलतियां की गई थीं, लेकिन इस तरह के गलतियां हमारे वर्तमान और भविष्य की शांति भंग करने का आधार नहीं हो सकतीं।”

इसके साथ ही न्यायलय ने कहा कि पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के उद्देश्य को लागू करने के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए और इसका उद्देश्य राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बनाए रखना है।

पूजा स्थल अधिनियम क्या है, इस विषय में भी हम अपने पाठकों को और विस्तार से बताने का प्रयास करेंगे, परन्तु पिछले कुछ दिनों में लगभग एक ही जैसे दो विषयों पर आए निर्णय से एक बड़े वर्ग में निराशा है जो एनसीईआरटी जैसी संस्थाओं द्वारा किए जा रहे अन्याय का न्याय मांगने न्यायालय आता है, परन्तु वहां भी उसे निराशा ही हाथ लगती है!

प्रश्न यही है कि इतिहास की तत्कालीन पुस्तकों एवं अभिलेखों में जो लिखा है, उसके आधार पर इतिहास न लिखकर वामपंथियों द्वारा गलत तथ्य पढ़ाए जा रहे हैं, उन पर कौन कदम उठाएगा?

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