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Saturday, January 22, 2022

विनोद दुआ की मृत्यु के बहाने फिर से उपजे असहिष्णुता के प्रश्न

खानेपीने की पत्रकारिता करने वाले एंकर विनोद दुआ की मृत्यु पर एक बार फिर से तलवारें खिंच गई हैं। ऐसा लग रहा है जैसे सारे दक्षिणपंथी खेमे में उनकी मृत्यु का जश्न मनाया जा रहा है। और कथित दक्षिणपंथी लोग खुश हैं, प्रसन्न हैं। कई लोग इस बात को लेकर दुखी हैं कि विनोद दुआ को लेकर लोग टिप्पणी कर रहे हैं।  दरअसल लोग टिप्पणी नहीं कर रहे हैं, वह अपने मन की बात कर रहे हैं।  जैसे विनोद दुआ को अपने मन की बात करने का अधिकार था, वैसे भी उन लोगों को भी अपने दिल की बात करने का अधिकार है, जिनकी भावनाएं उन्होंने आहत की थीं।

विनोद दुआ किसी भी प्रकार से खोजी पत्रकार नहीं रहे थे, हाँ आंकड़ों के आधार पर वह एक अच्छे प्रस्तोता कहे जा सकते थे, और उनकी राजनीतिक व्याख्याएं सुनाने की शैली उत्तम थी, परन्तु वह भाजपा के प्रति विरोध से भरी थी। जब भी किसी भी पत्रकार द्वारा भाजपा विरोधी पत्रकारिता की जाती थी, तो वह ऊपरी परत पर ही दल विरोधी होती थी, परन्तु वास्तविकता में वह हिन्दू विरोध की होती थी।

विनोद दुआ भी नरेंद्र मोदी के कटु आलोचक थे। वह मोदी के कटु आलोचक क्यों हो सकते हैं? यह हर कोई समझ सकता है! लोगों को उनके जायका इंडिया का कार्यक्रम के इस रवैये से परेशानी थी कि वह जैसे यह साबित करने पर उतारू हो गए थे कि जायका इंडिया का, में केवल “नॉन-वेज” भोजन ही सम्मिलित है। वह ऐसा प्रस्तुत करते थे जैसे भारत में अधिकांश लोग हड्डी ही चबाते हैं। और वह सामिष व्यंजनों की व्याख्या भी करते थे।

लोगों को सामिष और निरामिष भोजन से समस्या नहीं है, और न ही थी क्योंकि हर प्रकार के खानपान की आदतें हमारा हिस्सा रही हैं। पर वह भारत की पहचान केवल सामिष भोजन को बनाए जाने से कुपित थे। और जिस प्रकार से वह मगरमच्छ के बच्चे से बनी डिश की बात करते थे या फिर यहाँ तक कि कुछ लोग यह भी कहते हैं कि वह गौमांस से बने व्यंजनों को भी समिलित करते थे, लोगों को उससे समस्या थी। दरअसल लोगों को उनसे यही शिकायत थी।

विनोद दुआ एक अच्छे पिता, अच्छे दोस्त हो सकते हैं, और लोग अपने अपने दायरे में उनकी प्रशंसा कर सकते हैं जैसा कि कर रहे हैं। परन्तु आम लोगों के लिए वह एक ऐसे प्रस्तोता थे जो एक अलग माइंडसेट लेकर और अपना एजेंडा लेकर अपना कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे। भारतीय जनता पार्टी और विशेषकर नरेंद्र मोदी के वह कटु आलोचक थे, यही कारण है कि वह लोग भी उन्हें पत्रकार कह रहे हैं, जिन्होनें उनका एक भी शो भी शायद ही देखा हो। एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो नरेंद्र मोदी की आलोचना करने वाले आईएसआईएस को भी अपना खुदा बना बैठे, वही वर्ग एक प्रस्तोता को पत्रकार कहकर प्रस्तुत कर रहा है क्योंकि वह उसके बहाने नरेंद्र मोदी (हिन्दुओं) को कोस सकते हैं।

क्योंकि विनोद दुआ के दिल में विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल के लड़कों के लिए इतनी घृणा थी कि वह उन्हें लश्कर-तैयबा जैसे संगठनों के जैसा बताकर यह भी कह चुके थे कि वह आखिर क्यों नहीं पाकिस्तान जाते? और वीडियो में उन्होंने यह भी कहा था कि हमें यह भी नहीं पता कि क्या इन लोगों में वहां जाने की (अर्थात पाकिस्तान जाकर आतंकी हमला करने की) क्षमता है भी कि नहीं। वह पाकिस्तान से भारत की मिट्टी पर बदला लेना चाहते हैं!”

इसके साथ ही असंख्य बार उन्होंने गोधरा की एकतरफा रिपोर्टिंग से लोगों को निराश किया था। भारतीय जनता पार्टी के विरोध के चलते एक बड़ा वर्ग पूरी तरह से हिन्दू विरोधी हो गया था और विनोद दुआ उसमे अगुआ थे। उनकी बेटी मल्लिका दुआ, जिन्होनें अपने पिता के स्वर्ग जाने की कामना की थी, उन्हीं मल्लिका दुआ ने पुलवामा के शहीदों को लेकर जो टिप्पणी की थी, लोग उससे दुखी थे। लोग आहत थे। वही मल्लिका दुआ अपने पिता पर लगे यौन शोषण के आरोप पर महिला के साथ न खडी होकर अपने पिता के साथ खड़ी हो गयी थीं!

क्या कहा था मल्लिका दुआ ने:

मल्लिका दुआ ने बेहूदा टिप्पणी करते हुए कहा था कि लोग कह रहे हैं कि हमारे लोग शहीद हो गए हैं, आप अपनी लाइफ को कैसे नॉर्मली जी रही हैं। इस बारे में लोग प्रोटेस्ट करते दिख रहे हैं। मैं पूछना चाहती हूं कि हर रोज लोग भुखमरी, बेराजगारी, डिप्रेशन जैसी कई और वजहों से मरते हैं। ऐसा सिर्फ हमारे देश में नहीं होता, पूरी दुनिया में लोग मरते हैं, तब क्या आप अपनी जिंदगी रोक देते हैं, क्या हमारा काम सिर्फ शोक मनाना ही है।’

इस वीडियो के आते ही लोगों के दिल में आक्रोश की लहर दौड़ गयी थी क्योंकि पुलवामा हमला किसी व्यक्ति के घर का मामला नहीं था, बल्कि वह देश का मामला था और जो देश के लिए बलिदान हो गए थे, उनके प्रति लोग कृतज्ञता भाव से भरे थे।  और ऐसे में जब मल्लिका दुआ का यह वक्तव्य आया तो लोग आक्रोश से भर गए। उस समय कथित सरोकार की पत्रकारिता करने वाले विनोद दुआ ने एक भी शब्द विरोध में नहीं कहा था।

ऐसे ही दूसरा मामला था मल्लिका दुआ द्वारा “राष्ट्रवादियों” के मरने की कामना करने वाल वीडियो! लोगों को उस घृणा से घृणा है! मल्लिका दुआ ने अपने दंभ और कथित श्रेष्ठता भाव से भरकर ऐसे जनविरोधी वक्तव्य दिए, जिससे देश और धर्म से प्रेम करने वालों को धक्का लगा, यही कारण है कि लोग अब टिप्पणी कर रहे हैं।

आम जनता को अधिकार है अपनी राय व्यक्त करने का

आम जनता अपना राय व्यक्त करने का अधिकार बनाए रखते हुए प्रश्न उठा रही है। वह प्रश्न कर रही है कि आखिर एमजे अकबर से पुराने यौन शोषण के मामले में इस्तीफा लेने वाले वर्ग ने विनोद दुआ के मामले में चुप्पी क्यों साधी।  

मृतकों के उपहास की परम्परा आरम्भ कहाँ से हुई?

इसी वर्ष रोहित सरदाना की कोरोना से मृत्यु हुई थी, और उसके उपरान्त कथित सेक्युलर वर्ग ने जो प्रतिक्रिया दी थी, उससे आम जनता हतप्रभ रह गयी थी। उससे पहले सुषमा स्वराज, श्री अटल बिहारे वाजपेई एवं श्री अरुण जेटली की मृत्यु पर भी लिबरल जगत ने यही किया था। श्री मनोहर परिक्कर की मृत्यु पर भी एक विशेष वर्ग ने हर्ष व्यक्त किया था।

हालांकि किसी की कोई व्यक्तिगत शत्रुता विनोद दुआ से नहीं थी और न ही कोई उनपर व्यक्गित हो रहा है, बस यह विचारों के कारण जो घृणा उन्होंने अपने दर्शकों में बांटी, लोग उस पर प्रश्न उठा रहे हैं और यह आम जनता का अधिकार है कि वह बिना व्यक्तिगत हुए विचारों के आधार पर विरोध व्यक्त कर सके!

जो वर्ग आज दक्षिणपंथियों को कोस रहा है, वह वही वर्ग है जिसके लिए हिन्दू मैटर ही नहीं करते हैं और कहीं न कहीं वह उनका अस्तित्व नहीं स्वीकारते हैं! यह वही वर्ग है जिसके लिए हिन्दू मात्र घृणा का विषय है!

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