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Friday, May 20, 2022

उत्तर प्रदेश चुनाव परिणामों के उपरान्त कट्टरपंथी मुस्लिमों एवं लिब्रल्स के निशाने पर आए दलित?

उत्तर प्रदेश चुनाव परिणाम आने के बाद वह सभी लोग भौचक्के खड़े हुए हैं, जिन्होनें इतने वर्षों से कठिन श्रम के माध्यम से झूठे और विषैले नैरेटिव को तोड़कर रख दिया है। एक जो सबसे अनोखी बात देखी गयी है, वह है मुस्लिमों द्वारा दलितों को कोसा जाना। एक यह नैरेटिव बनाना कि “हमने दलितों के लिए इतना किया, परन्तु दलित को अपनी कट्टर हिन्दू पहचान ही चाहिए!” परन्तु यह यदि पूछा जाए कि आपने दलितों के लिए क्या किया, तो मात्र भारतीय जनता पार्टी या फिर ब्राह्मण के विरोध में ही वह लिखते हुए पाए जाएंगे।

उनका एक ही उद्देश्य होता है कि किसी भी प्रकार से समाज का वह वर्ग जिसे वह दलित कहते हैं, वह अपनी हिन्दू पहचान छोड़ दे, फिर इसके लिए उन्हें कुछ भी करना पड़े। आखिर यह कौन सी मानसिकता है, जिसमें वह उस वर्ग को अपना गुलाम मान बैठते हैं, जिसके हृदय में हिन्दू आस्था का ही निवास होता है और सबसे बढ़कर राजा राम होते हैं। क्यों वह आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग उन्हें अपना खरीदा हुआ लौंडा लगने लगता है जो उनकी हिन्दू विरोधी धुनों पर नाचेगा?

इससे पहले प्रगतिशील एवं सेक्युलर लेखकों के जो विचार थे वह बस इसी को लेकर थे कि कैसे स्वामी प्रसाद मौर्य के जाने से भारतीय जनता पार्टी को नुकसान हो रहा है, कैसे आशीष मिश्रा टेनी के कारण भारतीय जनता पार्टी हार रही है, कैसे हाथरस के चलते दलितों पर अन्याय हो रहे हैं आदि आदि! इन सभी के मामले में वह लोग पूरी तरह से यह अपेक्षा करते हैं कि वह वर्ग अपनी हिन्दू पहचान छोड़कर उनके साथ आ जाएगा, जबकि वास्तविकता यह है कि भारत में पसमांदा मुस्लिमों की बड़ी संख्या के दुखदर्द उन मुस्लिमों को दिखाई ही नहीं देते हैं, जो इन हिन्दुओं के कथित दर्द के आधार पर सत्ता हासिल करना चाहते हैं।

हाथरस सीट जीतने पर कट्टरपंथी मुस्लिमों एवं सेक्युलर्स की घृणा उभर कर आई

हाथरस काण्ड को भारतीय जनता पार्टी के लिए इन कट्टरपंथी मुस्लिमों एवं सेक्युलर्स ने कब्रगाह बताया था और इस प्रकार के लेख लिखे गए थे कि जैसे भारतीय जनता पार्टी ने ही यह करवाया था। संभवतया इन सभी के दिल में सपा के शासनकाल में हुए दो दलित बहनों के बलात्कार वाले मामले की स्मृति ताजा रही होगी, जिसमें कुछ यादवों ने सत्ता की हनक के चलते यह जघन्य काण्ड किया था, इतना ही नहीं लड़की के परिवार वालों ने यह भी आरोप लगाए थे कि पुलिस कर्मी, जो स्वयं यादव थे, उन्होंने भी उनकी बात नहीं सुनी थी और यह कहा था कि लडकियां या तो अपने आप आ जाएँगी या फिर पेड़ पर टंगी मिलेंगी।

इस घटना के बाद पूरे देश में आक्रोश भर गया था, और प्रदर्शन आदि हुए थे। इस सम्बन्ध में लड़कियों के घर वालों में इतना आक्रोश था कि उन्होंने समाजवादी पार्टी की सरकार से पांच पांच लाख की सहायता राशि लेने से इंकार कर दिया था।

तो कहीं न कहीं इस गैंग को यह विश्वास था कि यदि हाथरस का शोर मचाया जाएगा तो बदायूं सहित जो भी अन्य जघन्य काण्ड हुए थे, यहाँ तक कि सपा के नेता ने तो हाल ही में एक लड़की का अपहरण करने के बाद हत्या कर दी थी, जिसकी माँ का रोता हुआ वीडियो बहुत चर्चित रहा था। यह जो गैंग था, वह पूरी तरह इसी प्रयास में था कि किसी भी प्रकार से हाथरस के साए में बदायूं काण्ड के दाग धुल जाएं, परन्तु ऐसा नहीं हुआ! क्योंकि इसमें सरकार ने लड़की के परिवार की सभी मांगें मानते हुए सीबीआई जांच का आदेश दे दिया था।

परन्तु इस गैंग को संतोष नहीं हुआ था और वह बढ़ चढ़कर इसे इस प्रकार प्रसारित कर रहा था जैसे हिन्दू समाज के उस वर्ग के साथ इस सरकार का या कहें हिन्दुओं का दृष्टिकोण अत्यंत भेदभावपरक है। परन्तु यह झूठ था, यह सेक्युलर गैंग का फैलाया झूठ था। जैसे ही इस झूठ का गुब्बारा फूटा, वैसे ही इस पूरे गैंग ने आम जनता को कोसना आरम्भ कर दिया।

कांग्रेस के समर्थकों ने यह ट्वीट करना आरम्भ कर दिया कि हाथरस और लखीमपुर में भारतीय जनता पार्टी को जिताने का अर्थ है कि अधिकतर उत्तर प्रदेश वासी बलात्कार और क़त्ल की आजादी चाहते हैं:

मुस्लिम दलितों के नेतृत्व में नहीं रह सकते, ऐसा कुछ लोगों का मानना है और यही कारण है कि कुछ लोग कहते हैं कि वह मायावती को पसंद नहीं करते।

आरफा खानम का ट्वीट विशेष रूप से देखा जाना चाहिए।

Image
https://twitter.com/khanumarfa/status/1502551716448780292

इसके उत्तर में एक यूजर ने लिखा कि मुस्लिम कभी भी बसपा को तीन कारणों से वोट नहीं देते हैं:

  1. बसपा न केवल एक सामाजिक आंदोलन है बल्कि इसका एक धार्मिक (बौद्ध धर्म) जुड़ाव भी है जो मुसलमानों को पसंद नहीं है।
  2. मुस्लिम बसपा सरकार के तहत अपने धार्मिक एजेंडे को आगे नहीं बढ़ा सकते हैं जैसे वे सपा के तहत करते हैं।
  3. बसपा नेतृत्व महिलाओं और दलितों का है

इस ट्वीट को लेकर मुस्लिम उद्वेलित हो गए और इसका खंडन करने लगे, वह इस बात को प्रमाणित करना चाहते हैं कि चूंकि बसपा एक ऐसी पार्टी है जो कभी भी भाजपा के साथ मिल जाती है, इसलिए बसपा कभी मुस्लिम हितैषी नहीं हो सकती है।

मुस्लिम दलितों को हिंदुत्व के पैदल सैनिक कह रहे हैं:

सत्य तो यही है कि वह दलित वर्ग को एक ऐसा वर्ग मानते हैं, जिनकी अपनी कोई पहचान नहीं, यही कारण है कि वह न ही इन दलितों के नेतृत्व के अधीन कार्य कर सकते हैं और न ही पसमांदा मुस्लिमों के अधीन! बार बार इनकी यह घृणा झलककर बाहर आती है, बार बार यह घृणा यही कहती है कि दलित वर्ग मुस्लिमों का गुलाम है और कुछ नहीं, जब यह दलित वर्ग अपनी हिन्दू पहचान को गर्व से धारण करता है, वैसे ही यह भड़क जाते हैं,

एक यूजर ने इसे कोट करते हुए लिखा कि

इस बेहद कट्टर ट्वीट का सार यह है:

1) मुसलमान असहिष्णु हैं।

2) सपा के तहत, मुसलमानों का एक मजहबी एजेंडा होता है,

3) मुसलमान स्वाभाविक रूप से स्त्री द्वेषी हैं और जातिवादी भी।

पुनश्च: परिष्कृत दक्षिणपंथी इस्लामोफोबिक प्रचार वस्तुतः बहुत अलग नहीं है।

हाथरस की घटना हो या फिर ऐसी कोई भी घटना, कट्टरपंथी मुस्लिम एवं कथित लिब्रल्स तभी शोर मचाते हैं, जब निशाने पर या तो कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वर्ग से होता है या फिर वह अपनी हिन्दू पहचान से जुड़ा हुआ होता है!

परन्तु उन्होंने एजेंडा चुनने के स्थान पर अपनी पहचान और सुरक्षा चुनी, एवं भारतीय जनता पार्टी की सरकार चुनी, इसलिए वह निशाने पर हैं!

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