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Tuesday, November 30, 2021

यूरोप में फिर बढ़ते कोरोना के मामलों पर मीडिया का संवेदनशील और संयमित कवरेज: “हिन्दू” भारत के लिए नहीं थी यह संवेदनशीलता

यूरोप में एक बार फिर से कोरोना कहर ढा रहा है।  जर्मनी में इस महामारी से मरने वालों की संख्या एक लाख पार कर गयी है।  जर्मनी रॉबर्ट कोच इंस्टीटयूट के अनुसार इसमें मृत्यु दर 0।8% है। इसका अर्थ है कि 50,000 लोग इस वायरस से पीड़ित हो रहे हैं और इनमें से 400 लोग मारे जा रहे हैं। जर्मनी में पूर्वी और दक्षिणी जर्मनी में दबाव में हैं और कई संक्रमणरोग विशेषज्ञ यह कह रहे हैं कि और भी लोग मर सकते हैं।

https://www.aljazeera.com/news/2021/11/24/covid-cases-rising-in-the-americas-mirroring-europe-paho

वहां पर लॉक डाउन की स्थिति आ गयी है और सरकार कई और कड़े कदम उठाने की तैयारी में है। अस्पतालों ने चेतावनी दे दी है कि इंटेंसिव केयर बेड्स कम हो रहे हैं और दक्षिण एवं पूर्वी जर्मनी के अस्पतालों ने दूसरे क्षेत्रों में मरीज भेजे जाने शुरू कर दिए हैं।  जर्मनी में इस समय 68।1% लोग पूरी तरह से वैक्सीन लगवा चुके हैं। सरकार ने अनुरोध किया है, कि जिन लोगों ने छ महीने पहले वैक्सीन लगवाई थी, वह अब बूस्टर डोज़ लगवा लें।

वहीं ऐसा नहीं है कि यह स्थिति केवल जर्मनी में है, यह स्थिति यूरोप में है और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्यक्ष डॉ ट्रेडोस ने कहा है कि उन लोगों के भीतर सुरक्षा का झूठा भाव आ गया है, जो वैक्सीन ले चुके हैं। जबकि वैक्सीन बीमारी का खतरा कम करती है, वायरस और संक्रमण को नहीं।

फ्रांस से लेकर यूके तक हर देश में कोविड बढ़ रहा है। यूके में जहाँ बुधवार को 43,000 से अधिक मामले कोविड के आए थे तो वहीं पोलैंड में 28,000 मामले सामने आए हैं, नीदरलैंड में 24,000 मामले सामने आए हैं और फ्रांस में अगस्त से पहली बार कोविड के मामले 20,000 से अधिक हो गए हैं।

यूरोप का इतना बुरा हाल है। अमेरिका में भी स्थिति अच्छी नहीं है। परन्तु एक बात यहाँ पर गौर करने वाली है। 

हम सभी को भारत में कोविड की दूसरी लहर की भयावहता याद होगी। पाठकों को यह भी याद होगा कि कैसे मीडिया पागल कुत्तों की तरह कोविड के मरीजों के पीछे पड़ जाती थी। भारत का देशी मीडिया और साथ ही अंतर्राष्ट्रीय मीडिया भी इमरजेंसी रूप और चिताओं की तस्वीरें दिखाता था, और साथ ही कोविड के कारण मरने वाले लोगों के रोते हुए रिश्तेदारों की तस्वीरें कई फ्रेम से लेकर प्रकाशित करता था। ऐसा क्यों था, जबकि वैश्विक रूप से कोविड के कारण हुई मौतों में से आधी मृत्यु तो यूरोप और अमेरिका में ही हुई थीं। फिर भी यह पश्चिमी मीडिया  भारत को ही सबसे पिछड़ा दिखाने के चक्कर में, भारत की जलती चिताओं की तस्वीरें दिखा रहा था।

पश्चिमी मीडिया का रवैया भारत के प्रति अत्यंत हैरानी भरा था, ऐसा लग रहा था जैसे भारत में सड़कों पर लोग मर रहे हैं, और हर घर से कोई न कोई मृत्यु को प्राप्त हो रहा है।

यहाँ तक कि आज भी अमेरिका और यूरोप में कोविड के जो मामले हैं, वह एशिया से कहीं अधिक हैं। परन्तु मीडिया को यह नहीं दिखता। पश्चिमी मीडिया यूरोप और अमेरिका में इस समय हो रही कोविड मृत्यु पर मौन है। बहुत ही संवेदनशील रिपोर्टिंग कर रहा है।  कोई किसी भी अस्पताल में नहीं प्रवेश कर रहा है, न ही कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार से किसी भी कब्रगाह पर जा रहा है, किसी के परिवार से नहीं पूछ रहा है, परन्तु भारत में ऐसा नहीं था।

पश्चिम मीडिया ने पहले भी अपने यहाँ निजता का ध्यान रखा और अभी भी अमेरिका आदि स्थानों पर कब्र की तस्वीरें एवं रोते बिलखते परिजनों की तस्नवीरें हीं दिखाई जा रही हैं। परन्तु भारत में रायटर्स ने दानिश सिद्दीकी के माध्यम से ऐसी तस्वीरें प्रकाशित कीं, जो कहीं से भी संवेदनशील नहीं कही जा सकती थीं।

अब प्रश्न यह उठता है कि, जो मीडिया अपने देश के लिए इतना संवेदनशील था, और है, कि यूरोप और अमेरिका में कोविड भयावह रूप ले रहा है, परन्तु मीडिया में कोई शोर गुल नहीं है, वहां का मीडिया अपने देश और लोगों के साथ है, फिर भारत में क्या समस्या थी? भारत से इतनी घृणा क्यों थी? भारत से भी नहीं, हिन्दुओं से! और लॉक डाउन की इन तस्वीरों को कोई भी नहीं भूल सकता है, जिनके माध्यम से भारत को बदनाम किया गया:

https://www.bbc.com/news/av/world-asia-54486121

क्या हिन्दुओं का यह अधिकार नहीं है कि वह अपने लोगों का गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार कर सकें? क्या हिन्दुओं को यह अधिकार नहीं है कि वह अपने मृत परिवारीजनों पर रो सके? उसके रुदन को अपनी खबर बेचने के लिए और अपने सांस्कृतिक वर्चस्व कायम करने के लिए क्यों प्रयोग किया गया?

India coronavirus: Round-the-clock mass cremations - BBC News
https://www.bbc.com/news/in-pictures-56913348

पश्चिमी मीडिया का दृष्टिकोण अपने क्षेत्र की आपदाओं के विषय में कवर करने का अलग होता है और शेष दुनिया में अलग। अफ्रीका और एशिया उनके लिए ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ पर पिछड़े लोग रहते हैं, जहाँ के लोगों में बुद्धि नहीं है और यूरोपीय और अमेरिकी लोग पूरी दुनिया को सुधारने के लिए आए हैं। उनके लिए हिन्दू भारत पिछड़ापन या शैतान का गढ़ है, जिसे उन्हें हर स्थिति में सुधारना है, इसलिए वह यह नहीं बताते कि अमेरिका में कितने लोग मारे गए हैं, यूके और शेष यूरोप में कितना बुरा हाल है, और यहाँ तक कि अब तो वहां पर दंगे भड़क उठे हैं।

कोविड प्रतिबंधों के खिलाफ अब यूरोप में दंगे भड़क उठे हैं।  बेल्जियम, ऑस्ट्रिया, इटली आदि में लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।  नीदरलैंड में की शहरों में दंगे भडक उठे हैं।  इटली में ग्रीन पास का विरोध किया जा रहा है। फ़्रांस में पुलिस असंतोष दबाने में जुटी हुई है।  ऑस्ट्रिया की राजधानी विएना में लोगों ने “आजादी” के नारे लगाए।

Covid: Huge protests across Europe over new restrictions - BBC News

वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यूरोप में कोरोना के बढ़ते मामलों पर चिंता जताई है।

परन्तु पश्चिम मीडिया, या कहें ईसाई मीडिया अपनी ओर नहीं देख रही है और “हिन्दू” भारत को निशाना बनाती है।

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