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Thursday, July 7, 2022

“पहले प्लंबर का काम, फिर अख़बार बांटा और फिर बलात्कार में विफल रहने पर आसिफ ने कर दी प्राची की हत्या!” हिमाचल में उना में लोगों में रोष है, पुलिस ने कहा “साम्प्रदायिक घटना नहीं”

उना में पंद्रह वर्ष की प्राची को यह पता भी नहीं होगा कि जिसके लिए वह दरवाजा खोल रही है, वह किसी और कारण से उसके घर आ रहा है और वह उसकी हत्या कर देगा। हिमाचल प्रदेश में मात्र पंद्रह वर्ष की प्राची की हत्या 23 वर्षीय आसिफ ने इसलिए कर दी क्योंकि उसने बलात्कार का विरोध किया। आसिफ को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है और पुलिस के अनुसार 5 अप्रेल 2022 को दोपहर 1 बजे के करीब मृतका के घर के आसपास एक अख़बार बांटने वाले युवक आसिफ को देखा गया था।

इस सूचना के आधार पर उस युवक से पूछताछ की गयी तो उसने बताया कि उसने पिछले वर्ष मृतका के घर पर प्लंबर का काम किया था, और उसके बाद से वह इस क्षेत्र में अख़बार बांटने का काम कर रहा था। फिर 5 अप्रेल को वह मृतका के घर पर अख़बार के पैसे लेने गया था तो उसने देखा कि वह घर पर अकेली थी। जब मृतका ने घर का दरवाजा खोला तो उसने अकेलेपन का फायदा उठाना चाहा और जब उसने विरोध किया तो उसने उस लड़की का गला धारदार हथियार से काट दिया और फिर भाग गया।

आरोपी को 4 दिनों की पुलिस रिमांड पर लिया गया है और पूछताछ जारी है!

हालांकि पुलिस का कहना है कि इसमें कोई साम्प्रदायिक एंगल न खोजा जाए, परन्तु क्या ऐसा नहीं लगता कि यह प्रमाणपत्र देने में पुलिस ने कुछ शीघ्रता कर दी है। क्योंकि न ही तब तक पूछताछ की गयी थी और न ही आसिफ का ऐसा इतिहास खंगाला गया था, जिससे यह पता चल सके कि वह किसी भी प्रकार से मजहबी साहित्य से प्रेरित नहीं था?

इस मामले को लेकर लोगों में बहुत रोष है और वह त्वरित कार्यवाही की मांग कर रहे हैं

लोगों का साफ कहना है कि उन्हें राजनीति नहीं चाहिए, उन्हें राजनीति से कोई मतलब नहीं है, पर हाँ यह बात सही है कि हिमाचल में यह (पैटर्न) शुरू हो गया है और वह नहीं चाहते कि ऐसी कोई और घटना हो।

उना के पुलिस सुपरिटेंडेंट ने अर्जित सेन ठाकुर ने कहा है कि “पुलिस ने सूचना पाते ही घटनास्थल का दौरा किया और फोरेंसिक एक्सपर्ट की एक टीम ने अपराध के सीन से सबूत इकट्ठे किये तो वहीं पुलिस ने डॉग स्क्वैड की मदद से जगह की जाँच की। घर में यह संकेत नहीं मिले हैं कि आरोपी ने जबरन प्रवेश किया हो, इसलिए यह ताब पता चलती है कि आरोपी पीड़ित से बहुत अच्छी तरह से परिचित था।”

फिर उन्होंने कहा कि “आरोपी ने लड़की के अकेलेपन का फायदा उठाना चाहा और जब उसने विरोध किया तो उसने पास रखा हुआ पेपर कटर उठाया और गला रेत दिया। उस इलाके में लोगों ने और आरोपी के कॉल रिकार्ड्स इस बात की पुष्टि करते हैं कि वह वहीं पर था”

वहां की बार एसोसिएशन की एक तत्काल मीटिंग हुई और जिसमें यह तय किया गया कि आरोपी का मुकदमा कोई भी नहीं लडेगा।

फिर भी यह कहना कि कोई साम्प्रदायिक कोण नहीं है, गले से नहीं उतरता, क्योंकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बार बार यह सन्देश मुस्लिम समुदाय के युवकों तक किसी न किसी तरीके से पहुँचता ही है कि हिन्दू लड़कियों का बलात्कार कोई बड़ी बात नहीं है, जैसा हमने नदीम वाले मामले में देखा था, जिसमें वह हिन्दुओं को एके 47 से मारने और हिन्दू लड़कियों का बलात्कार करने की बात कर रहा था।

पाठकों को याद ही होगा कि अभी हाल ही में जब हिजाब पर बहस तेज हुई है तो मुस्लिम समुदाय के एक बड़े वर्ग ने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि जो लडकियां हिजाब नहीं पहनती हैं उनका बलात्कार हो जाता है। सपा के सांसद ने भी अभी हिजाब को बलात्कार को रोकने वाला बताया था। तो ऐसे में क्या यह जांच हुई कि आसिफ ऐसे किसी भी व्यक्ति से प्रभावित नहीं था या सुना नहीं था उसने ऐसे किसी को?

हमने देखा है कि कैसे हाल ही में इस्लाम में मतांतरण के कई रैकेट पकडे गए हैं और साथ ही एक दो नहीं कई मामले सामने आए हैं, जैसे निकिता तोमर, हाल ही में राजस्थान की स्वाति राजपूत, छतीसगढ़ में हुई किशोरी की साबिर अली द्वारा की गयी हत्या, और ऐसे ही तमाम मामले जो रोज सामने आ रहे हैं। क्या इनमें कोई पैटर्न नहीं है? क्या इनमें कुछ भी विशेष नहीं है?

सही कहा जाए तो इनमें पैटर्न है और पैटर्न है कि हिन्दू लड़कियों को या तो जाल में फंसाया जाए और जब निकिता तोमर या प्राची जैसी लडकियां जाल में फंसने से इंकार करें तो या तो उन्हें दिन दहाड़े गोली मार दी जाए या फिर गला रेत दिया जाए?

एक और प्रश्न उठता है कि इतना साहस कहाँ से आता है? इतना साहस क्या उस नफरत से पैदा होता है जो गैर मुस्लिमों के प्रति इनके दिलो में भर दी जाती है? जैसे मिस्र में एक महिला प्रोफेसर ने कहा था कि अल्लाह देते हैं कि गैर मुस्लिम महिलाओं से रेप की इजाजत!

https://www.jansatta.com/international/allah-allows-muslims-to-rape-non-muslim-women-in-order-to-humiliate-them-claims-islamic-professor/62232/

मिस्र की अल-अजहर यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सुआद सालेह ने गैर मुस्लिम महिलाओं को लेकर कहा था कि अल्लाह ने मुस्लिम पुरुषों को गुलाम औरतों के साथ यौन संबंध बनाने और उनका अपमान करने की इजाजत दी है, जो कि इस्लाम में वैध है।

तो क्या आसिफ वाले मामले में क्या पुलिस ने यह अध्ययन कर लिया था कि आसिफ पर ऐसे किसी का प्रभाव तो नहीं है? जो भी है, यह एक पैटर्न है और अब यह पैटर्न बहुत ही तेजी से बढ़ रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे हिन्दू लड़कियों के विरुद्ध एक युद्ध है, जिसमें किसी न किसी प्रकार से उन्हें केवल अपने जाल में ही फंसाना है और जब वह बात न मानें तो उनका क़त्ल जायज है!

परन्तु यहाँ पर समस्या एक और है, और वह समस्या है फेमिनिस्ट कार्यकर्ताओं का मुस्लिम पहचान से प्रेम! मुस्लिम पहचान नहीं बल्कि इस्लाम के प्रति कट्टरता दिखाने वालों से प्रेम, जिसके दिल में गैर मुस्लिमों के प्रति नफरत हो, उन्हें ऐसे मुस्लिम ही पसंद आते हैं. तो ऐसे में जब भी किसी प्राची, किसी निकिता तोमर की हत्या की जाती है तो वह शोर मचाने के स्थान पर उस अपराधी के पक्ष में ही जैसे जाकर खड़ी हो जाती हैं. और अपराध करने वालों को नैतिक समर्थन फेमिनिज्म का मिलता है कि “अल्पसंख्यक तो बेचारा पीड़ित है, किसी कारणवश अपराध कर दिया होगा, उसे सजा नहीं होनी चाहिए!”

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