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Saturday, December 4, 2021

सेवानिवृत्त जनरल ने सोनिया और मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को राष्ट्र के विनाश की चेष्टा करने के लिए फटकार लगाई

यूपीए शासन के तहत 2004 से 2014 की अवधि को एक से अधिक कारणों से भारत के “क्षय के दशक” के रूप में जाना जाता है। यहां सेनानिवृत लेफ्टिनेंट जनरल  द्वारा लिखा गया एक अंश है जो दिखाता है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन ने राष्ट्रीय सुरक्षा को नष्ट करने की कोशिश की।


मैंने आरवीएस मणि द्वारा लिखित “द मिथ ऑफ हिंदू टेरर” नामक पुस्तक पढ़ी है, और मुझे यकीन है कि यह लेखक हर देश प्रेमी के लिए एक घरेलू नाम है। जो लोग उन्हें नहीं जानते उनकी जानकारी के लिये ये बता दूँ की वह 2006 से 2010 के बीच यूपीए शासन के महत्वपूर्ण कालावधी में एक मध्यम पायदान के नौकरशाह थे। अगर उस समय की लांछनास्पद घटनाओं को याद किया जाए, तो आपको आश्चर्य ही  होगा कि इसमें लिप्त लोगों ने पाकिस्तानी संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ ली थी, या भारतीय संविधान के प्रति?

मुझे आश्चर्य होता है कि क्या यह संभव है कि आप राष्ट्र के लिए शपथ लें और आपको दी गई सभी आधिकारिक शक्तियों का उपयोग आप उसी राष्ट्र को नष्ट करने में लग लगा दें? वास्तव में इसके लिए एक मूर्ख नौसिखिए प्रधानमंत्री के तहत कुछ कपटी कैबिनेट मंत्रियों की जरूरत थी जिन्होंने एक इतालवी मूल के भारतीय नागरिक को अपना अन्तश्चेतना और निष्ठा बेच दिया था।

पुस्तक में वर्णित घटनाओं की प्रमाणिकता के बारे में सवाल उठाए जाते हैं। इसमें सभी देशद्रोहियो के नाम लिखे हैं  जिन्होंने राष्ट्र के खिलाफ अपराध किए हैं – यदि नहीं किये थे, तो उन्हें अदालत में जाना चाहिए था और लेखक पर मानहानि का आरोप लगाना चाहिए था। इन पूर्व मंत्रियों तथा सरकारी अधिकारियों में से एक में भी उनका सामना करने की या उन्हें न्यायालय ले जाने की हिम्मत नहीं थी। श्री मणि ने कई बार साक्षात्कार भी दिए हैं, अगर वह मनगढंत थे तो फिर  उसका सामना क्यों नहीं किया गया? जिओपी (कांग्रेस) के एक भी प्रवक्ता ने एक बार भी इस पुस्तक के अंतर्वस्तु विषय पर कोई वाद विवाद  या विरोध नहीं किया – और यह वही लोग हैं जो हर संभव दृष्टांत पर अपने देश को शर्मसार करने के लिए तैयार रहते हैं, जो कि सीएए पर मिथ्या वादी भावात्मक विवरण दे कर अपने ही लोगों पर हिंसा का कारण बने। इस पुस्तक के विषय वस्तु के बारे में अज्ञान होने का स्वांग रचना और इसके अस्तित्व को ही  नकारना, यही इन गद्दारों की रणनीति है।

हिंदू आतंक के मिथक की उत्पत्ति तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल के कार्यालय में ही हुई थी, और  उनके कार्यालय में मंत्री के अलावा दिग्विजय सिंह और एक पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे थे। यहीं  पर श्री आरवीएस मणि को 1 जून 2006 को बुलाया गया था और हाल ही के आतंकवादी कार्यों की कुछ जानकारी देने के लिए कहा गया था, यह सुनिश्चित करने के लिए कि मंत्रालय और इस षड्यंत्र में शामिल सभी एक ही पृष्ठ पर हों।

करकरे बाद में महाराष्ट्र में एटीएस के प्रमुख बने और हिंदू आतंकवाद की झूठी कहानी को बढ़ाया। इसका उद्देश्य आरएसएस और बीजेपी पर प्रतिबंध लगाना था और देश में होने वाले कई विस्फोटों के लिए उन्हें दोषी ठहराया जाना था। झूठी कथा को विश्वसनीय बनाने के लिए बहुत सारे निर्दोष लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

नांदेड़, मालेगांव, जर्मन बेकरी, मक्का मस्जिद और समझौता एक्सप्रेस में हुए विस्फोटों की तरह हर आतंकवादी घटना में एक हिंदुत्व के कोण को प्रस्तावित किया गया था। मालेगांव विस्फोट 8 सितंबर 2006 को हुआ था, और सबसे पहले जिस पर शक था वो था इस्लामिक आतंकवादी संगठन एह-ले-हदीस। हालांकि 12 सितंबर 2006 को पीएम मनमोहन सिंह ने कहा कि इस घटना में हिंदू समूहों की भागीदारी को ‘नकारना या  स्वीकारना’ दोनों ही अनुचित होगा। जरा देखिए कैसे देश के सर्वोच्च कार्यालयों से धीरे-धीरे एक झूठी कथा का प्रक्षेपण शुरू होता है।

दो साल बाद दूसरा मालेगांव ब्लास्ट हुआ। यह मामला मुंबई एटीएस के हेड हेमंत करकरे के हांथों में सौंपा जाता है। कुछ ही दिनों में लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित, साध्वी प्रज्ञा और अभिनव भारत के सदस्यों को गिरफ्तार  कर लिया गया। कर्नल पुरोहित को एटीएस ने पांच दिनों तक प्रताड़ित किया। मालेगांव ब्लास्ट में उन्हें इकबाली साक्षी बनने के लिए बाध्य किया जा रहा था, जिसके लिए उन्होंने माना कर दिया।

उनमें से किसी के खिलाफ  सबूत नहीं मिले, और अदालत ने उन्हें कई साल बाद जमानत दे दी। एनआईए ने भी उन्हें किसी भी तरह की संलिप्तता से बरी कर दिया। पुरोहित 9 साल की कैद के बाद जेल से बाहर आए। करकरे 26/11 के आतंकी हमले में मृत्यु को प्राप्त हुए, जब वो तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और 4 कॉन्स्टेबल के साथ जीप में सवार होकर आ रहे थे और अजमल कसाब और इस्माइल खान  द्वारा की गई  गोलियों की बौछार में मारे गए। उन दोनों आतंकवादियों ने उनके शवों को सड़क किनारे फेंक दिया और उनकी गाडी लेकर वहां से भाग निकले ।

अब 26/11 को हुई इस आतंकवादी कार्यवाही की प्रतिक्रिया को देखें। आपमें से जो लोग नहीं जानते उनकी जानकारी के लिए बता दूं की गृह सचिव सहित ग्रह मंत्रालय (एम.एच.ए)  के सभी अधिकारी गृह सचिव स्तर की वार्ता के लिए पाकिस्तान गए हुए थे. यह वार्ता 25 नवंबर को समाप्त होने वाली थी ,और प्रतिनिधिमंडल को 26 नवंबर 2008 को वापस लौट आना था लेकिन वार्ता पाकिस्तान के इशारे पर एक दिन बढ़ा दी गई। और प्रतिनिधिमंडल को एक हिल स्टेशन मुर्री की यात्रा पर भेज दिया गया।

मुर्री की विशेषता यह है कि यहां सभी मोबाइल नेटवर्क संचार से बाहर है, इसलिए जब मुंबई में तबाही हुई तब ग्रह मंत्रालय के अधिकारी मुर्री में मनोरंजन में व्यस्त थे। मैंने इस घटना के बारे में पहले भी लिखा है, इसलिए मुंबई में आतंकवादी हमले की घटना पर कोई निर्णय लेने के लिए एम.एच.ए में कोई भी नहीं था। गृहमंत्री भी उपलब्ध नहीं थे, ताकि आतंकवादियों को यथासंभव पीड़ितों को मारने के लिए पर्याप्त समय मिल सके।

अंत में जब दिल्ली में एनएसजी को जवाबी कार्यवाही करने का आदेश दिया गया और वे विमान में अपने साजो-सामान के साथ जाने को तैयार हुए, तो गृह मंत्री शिवराज पाटिल भी ने उसी उड़ान से जाने का तय किया।  वह देर से पहुंचे, और इस तरह एनएसजी को भी देर करवाई गई जिससे आतंकवादियों को नरसंहार करने के लिए पर्याप्त समय मिल गया।

ऐसे हैं हमारे राजनेताओं और नौकरशाहों के छल कपट पूर्ण व्यवहार। ये वो ही हैं जिनके ऊपर हमारे देशवासियों की जीवन की रक्षा का दायित्व है। हिंदू आतंक की झूठी कथा को पाकिस्तान द्वारा खुशी-खुशी स्वीकार लिया गया। 26/11 के बाद पाकिस्तान ने भी इस हमले को भारत के तथाकथित ‘हिंदू ब्रिगेड’ पर थोपने की कोशिश की। संयोग से सभी 10 आतंकवादियों के पास हिंदू नामों के पहचान पत्र थे।

2008 में तत्कालीन पुलिस आयुक्त राकेश मैरी ने अपनी पुस्तक ‘लेट मी से नाउ’ में  इसकी और अधिक पुष्टि करी है। इस पुस्तक में दी गई जानकारी के मुताबिक अजमल कसाब को सुनील चौधरी के रूप में अपने दाहिने हाथ पर एक लाल रंग के कलावे के साथ मरना था, जो  की एक हिंदू द्वारा पहने जाने वाला एक पवित्र धागा है। ये  मंदिर में जाकर पहना जाता है। ये ‘हिंदू आतंक’ की अवधारणा को बल देने की एक चाल थी।

गृहमंत्री शिवराज पाटिल; उनके गृह सचिव, जो सुरम्यम मुर्री के आनंद उठा रहे थे, मधुर गुप्ता; पीएम डॉ मनमोहन सिंह; और इस पूरे तंत्र की महानायिका थी एस.जी। आई एस आई और भारतीय सरकार दोनों मिलजुलकर, सोच विचार कर काम को अंजाम दे रहे थे क्योंकि वे दोनों ही इसे हिंदू आतंकवाद के रूप में दिखाना चाहते थे।

तथ्यों को हमने आपके सामने रख दिया है; आप अपना निष्कर्ष स्वयं निकाल लीजिए। इसके बाद हैडली  से पूछताछ हुई जिसे यूएसए में आतंकवाद के लिए दोषी ठहराया गया था, और 35 साल की कैद की गई थी। आई एस आई की ओर से 26/11 के आतंकी घटना को अंजाम देने के लिए हेडली ने भारत में संभावित ठिकानों का पूर्व सर्वेक्षण किया था।

हेडली ने पूछताछ के दौरान इशरत जहां और उसके साथियों का एसआई मॉड्यूल के रूप में विवरण  दिया था जिन्हें विशेष रूप से मोदी जी की हत्या के लिए भारत भेजा गया था, जो कि उस दौरान गुजरात के मुख्यमंत्री थे। किंतु 15 जून 2004 को अपने लक्ष्य तक पहुंचने के पहले ही इस मॉड्यूल का भांडा फूट  गया और आतंकवादियों का सफाया कर दिया गया। यह एक शानदार जवाबी कार्यवाही थी।

इशरत जहां मुठभेड़ मामला अदालत में था; और हेडली की पूछताछ की रिपोर्ट गुजरात काउंटरइंटेलिजेंस फौज के बचाव के लिए महत्वपूर्ण थी जिसने इशरत जहां आतंकवादी मॉड्यूल को खत्म कर दिया था। अब भारत मां के पीठ  में छुरा भोंकने की बारी पी चिदंबरम की थी। हैडली द्वारा इशरत जहां को लेकर  अदालत में दिए गए बयान को पी.सी. ने बड़ी चतुराई से हेरफेर करवा दिया। फिर क्या था, पुलिस कर्मी अपराधी घोषित हो गए, और आंतकवादी बलिदानी। क्या कोई भारतीय ये मान सकता है? हां, अविश्वसनीय है लेकिन यही सच है! हमारे देश के गृहमंत्री ने आईएसआई पाकिस्तान द्वारा भेजे गए आतंकवादियों को शहीद बनाने के लिए अपने स्वयं के पुलिसकर्मियों को आरोपी बनवा डाला।

पहला हलफनामा और दूसरा हलफनामा वाली दोनों ही फाइलें  पीसी द्वारा अनुमोदित है, और यह दोनों ही ऍमएच्ए [मिन्स्ट्री ऑफ़ होम अफेयर] ऑफिस से गायब हैं ताकि देशद्रोह का ये काला कृत्य अंधेरों में ही रहे। गुमशुदा दस्तावेजों की प्राथमिकी दर्ज की गई है।

2002 में गोधरा ट्रेन के आगज़नी हादसे में 59 कारसेवक झुलस गए थे और 48 घायल हुए थे। अपराधियों की पहचान की गई और 134 को आरोपित किया गया। मृतकों से एक के पिता सरदार जी मेघनजी वाघेला सुरेश ने फरवरी 2009 में गुजरात हाईकोर्ट में यह याचिका दायर की थी कि आरोपियों पर पोटा (POTA) के तहत मुकदमा चलाया जाए। आतंकियों का प्रतिनिधित्व उन  ‘उदार-ह्रदय’ में से एक नें किया जो कि हर आतंकवादी के ‘अधिकारों’ के लिए लड़ते हैं और उनके मामले को भारतीय न्यायिक प्रणाली के जाल में उलझा देते हैं – निथ्या रामाकृष्णन।

उनके जैसे याचिकाकर्ता 59 मनुष्यों के जीवन के अधिकार की परवाह नहीं करते लेकिन आतंकवादियों के ‘अधिकारों’ की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अपने ही राष्ट्र को आतंकित होने देने पर जरा भी संकोच नहीं करते। वैसे भी मुझे उन जैसे लोगों से और कोई  बेहतर उम्मीद भी नहीं। हालांकि यह जानकर आपको और आश्चर्य होगा कि उस आतंकवादी का बचाव करने के लिए एक और अधिवक्ता तैयार था। यह शख्स कोई और नहीं बल्कि भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम थे जिन्हें यूपीए सरकार द्वारा आतंकवादियों के बचाव के लिए नियुक्त किया गया था ताकि उन पर पोटा के तहत कोई धारा ना लगे।

जाहिर है इन 134 अभियुक्तों के लिए मदद सबसे अप्रत्याशित स्तोत्र से आई थी जोकि तत्कालीन गृह मंत्री थे, जिन्होंने यह सुनिश्चित किया कि गोधरा ट्रेन जलाने की घटना में 50 से अधिक भारतीयों को जिंदा जलाने वाले आतंकवादियों पर पोटा के तहत कोई कार्यवाही ना हो। क्या कोई सही सोच वाला भारतीय इसे मान सकता है? देखिए कैसे यूपीए सरकार इन आतंकवादियों के साथ साझेदार थी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आतंकवादियों के अधिकारों को हर कीमत पर बचाया जा सके, क्योंकि भारतीयों की जान का नुकसान तो उनकी नजर में कोई मायने ही नहीं रखता।

समीक्षा याचिका सुप्रीम कोर्ट के पास गई जहां सरदार जी वाघेला और गुजरात राज्य सरकार, दोनों ने ही गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील की। यहां भी अपराधियों का भारत संघ द्वारा पूरी तरह से बचाव किया गया और यह सुनिश्चित किया गया कि उन पर पोटा के तहत कोई आरोप नहीं लगाया जाए। आपको बता दें कि उस दौरान भारत के गृह मंत्री थे पी चिदंबरम और  प्रधानमंत्री थे मनमोहन सिंह।

अब हम यह समझ सकते हैं, कि भारतीय लोग इतने शताब्दियों तक गुलाम क्यों बने रहे, क्योंकि हम अपने चरित्र को सामूहिक रूप से नष्ट करने की विशिष्टता रखते हैं, अगर हमें व्यक्तिगत रूप से अपने राष्ट्र को बेच कर लाभ उठाने का मौका मिले तो। कृपया याद रखें कि भविष्य हमारे हाथ में है। हम सभी को पहले उग्र महामारी पर विजय प्राप्त करने की आवश्यकता है। इससे हमें खुद को भारतीय के रूप में एकजुट करने में मदद मिल सकती है। यह संकट हमें अपने राष्ट्रवाद को गढ़ने, विकसित करने और अपने देशवासियों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए एक महान अवसर प्रदान करता है। अब गेंद हमारे पाले में है…… ।

-लेफ्टिनेंट जनरल पी जी कामथ (भारतीय सेना और रक्षा विश्लेषक के दिग्गज जनरल)

(रागिनी विवेक कुमार द्वारा इस अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद)


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