“विचार: विवादों के केंद्र में शंकराचार्य, कार्य और व्यवहार से हिंदू समाज निराश”, जागरण, फ़रवरी 27, 2026
“शंकराचार्य भारत की अनोखी त्याग परंपरा का विस्तार हैं। आदि शंकराचार्य ने विश्व दर्शन को अद्वैत दर्शन से समृद्ध किया। अल्प आयु में ही उन्होंने 11 प्रमुख उपनिषदों, गीता और ब्रह्मसूत्र का भाष्य किया। सांस्कृतिक एकता के लिए पूरे देश का भ्रमण किया। बौद्ध एवं अन्य विद्वानों से उनका शास्त्रार्थ हुआ। उन्हें सभी स्थानों पर विजय मिली।
शंकराचार्य के भ्रमण को उस समय दिग्विजय कहा गया। उन्होंने सांस्कृतिक विचारधारा को प्रवाहमान बनाने के लिए चार मठों की स्थापना की। कर्नाटक में शृंगेरी, उत्तराखंड में जोशीमठ, ओडिशा में पुरी और गुजरात में द्वारका। उनके चार विद्वान शिष्यों ने मठों का नेतृत्व किया। उन्होंने चारों वेदों को प्रतिष्ठा दी।
सभी मठों को एक वेद से जोड़ा-शृंगेरी पीठ, कर्नाटक-यजुर्वेद, द्वारका पीठ, गुजरात-सामवेद, पुरी पीठ, ओडिशा-ऋग्वेद, ज्योतिर्मठ, उत्तराखंड-अथर्ववेद। वे द्रष्टा थे। अद्वैत वेदांत उनका दर्शन था। डॉ. एस. राधाकृष्णन ने उन्हें असाधारण प्रतिभाशाली व्यक्ति बताया था……”
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