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Thursday, October 6, 2022

आंध्रप्रदेश सरकार ने ‘बंदोबस्ती विभाग’ का बकाया चुकाने के लिए मंदिरों को ‘सावधि जमा’ तोड़ने का आदेश दिया, क्या अब सरकारें अपने खर्च भी मंदिरों से वसूलेंगी?

भारत एक अनोखा देश है, जो कहने को तो संवैधानिक रूप से एक सेक्युलर देश है, जहां हिन्दू बहुलता में हैं, लेकिन सच्चाई इसके एकदम उलट है। यहाँ हिन्दुओं का शोषण होता है, उनके त्यौहार मानाने पर अघोषित रोक लगाई जाती है, कभी उनकी संस्कृति, कभी उनके धर्म, और कभी उनके दैनिक जीवन पर तमाम तरह की अड़चनें लगाईं जाती रही हैं। और तो और, हिन्दू जो धन अपने मंदिरों में चढ़ाते हैं, उसे भी हड़प लिया जाता है।

ऐसा ही मामला पिछले दिनों आंध्रप्रदेश में देखा गया है, जहां कई मंदिरों को पिछले आठ वर्षों से बंदोबस्ती विभाग के बकाया वैधानिक शुल्क का भुगतान करने के लिए अपनी सावधि जमा को समय से पहले रद्द करना पड़ा है। आप हैरान हो सकते हैं, गुस्सा हो सकते हैं, लेकिन सत्य यही है। कमाल की बात यह है कि आंध्रप्रदेश बंदोबस्ती आयुक्त, एम हरि जवाहरलाल ने 18 जून, 2022 को एक पत्र जारी किया था, जिसमें मंदिरों के सभी कार्यकारी अधिकारियों को बंदोबस्ती विभाग पर बकाया शुल्क को चुकाने अथवा अनुशासनात्मक कार्रवाई का के लिए तैयार रहने का निर्देश दिया था।

आंध्रप्रदेश सरकार ने कहा कि विभाग की बकाया राशि के लिए मंदिरों की सहायता लेने का निर्णय किया गया है। लेकिन इस विषय को गहराई से देखें तो पता लगता है कि पिछली सरकारों की अकर्मण्यता के कारण यह परिस्थिति उत्पन्न हुई है, और सरकार मंदिरों से पैसा ऐंठ कर अपना काम निकालना चाहती है। यहाँ यह भी देखने वाली बात है, कि सरकार ने किस प्रकार की धमकाने वाली भाषा का प्रयोग किया है। अब इस विषय पर राज्य सरकार और भाजपा के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गयी है, क्योंकि भाजपा ने इसे हिंदू मंदिरों पर हमला करार दिया गया है।

आंध्रप्रदेश सरकार कहती है कि1966 के आंध्र प्रदेश चैरिटेबल और हिंदू धार्मिक संस्थान अधिनियम के अनुसार, सालाना 5 लाख रुपये से अधिक की कमाई वाले मंदिरों को इसका 8% एंडॉमेंट्स एडमिनिस्ट्रेटिव फंड (ईएएफ), 9% कॉमन गुड्स फंड (सीजीएफ), 3 को देना है। अर्चकस वेलफेयर फंड (AWF) के लिए%, और ऑडिट शुल्क के लिए 1.5%। इसका अर्थ है कि 5 लाख रुपये प्रति वर्ष से अधिक आय वाले सभी मंदिरों को अपनी वार्षिक आय का 21.5% बंदोबस्ती विभाग को देना होता है। लेकिन यह मंदिर भुगतान नहीं कर रहे थे, और 1,776 बंदोबस्ती संस्थानों पर 353.80 करोड़ रुपये की राशि बकाया है; जिसमें से मंदिरों ने अप्रैल और मई के महीनों में 42 करोड़ रुपये भेजे हैं।

सरकार के अनुसार, हिन्दू मंदिर बकाया भुगतान न करने के कारणों के रूप में ठेकेदारों को भुगतान करने और लंबित विकास कार्यों का बहना बनाते हैं । वे कहते हैं कि महामारी के कारण मंदिरों में श्रृद्धालुओं का आना कम हो गया है, जिस कारण उनकी कमाई भी काम हो गयी है। सरकार ने मंदिरों को कड़ाई ने उनकी बकाया राशि का भुगतान करने का आदेश दिया है, भले ही उन्हें ऐसा करने के लिए अपनी सावधि जमा रसीदों को भुनाने की आवश्यकता हो। विभाग के उपायुक्तों को बकाया का भुगतान नहीं करने वाले सभी लोगों की पहचान करने और शुल्क का मसौदा लेख प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

मात्र हिन्दुओं के मंदिरों पर ही सरकार की कुदृष्टि क्यों?

देश में हर धर्म और मजहब के स्थल हैं, लेकिन सरकारी नियंत्रण में मात्र हिन्दुओं के धार्मिक स्थल और मंदिर ही है। इन मंदिरों की कमाई का एक ही स्त्रोत है, श्रद्धालुओं द्वारा दिया गया दान, जिसे मंदिर प्रशासन बैंक में जमा करा देता है, उनकी सावधि जमा पर मिलने वाले ब्याज से उन्हें आर्थिक सम्बल मिलता है। सरकार हर वर्ष सैंकड़ो करोड़ रूपए इन मंदिरों ने अलग अलग मदों में वसूल कर लेती है, और इन मंदिरों को पूरी तरह सरकार पर निर्भर रहना पड़ता है।

वहीं देशभर में वक़्फ़ और चर्च की हजारों करोड़ की सम्पत्तियाँ हैं, उन पर किसी भी तरह का सरकारी नियंत्रण भी नहीं होता। सरकार उनके आर्थिक विषयों में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं करती और ना ही उनसे कुछ वसूल करती है, हाँ उन्हें सरकारी सहायता के नाम पर सैकड़ो करोड़ रूपए का चढ़ावा जरूर चढ़ाया जाता है। क्या यह नैतिक रूप से गलत व्यवस्था नहीं है?

सरकारें करती हैं मंदिरों के धन का दुरूपयोग

अगर सरकारें मंदिरों का धन ले कर उन्हें हिन्दू हित या धर्म के प्रचार प्रसार में खर्च करे तो फिर भी समझ आता है। लेकिन सरकारें इस धन का दुरूपयोग अपनी योजनाओं में करती हैं, और अपना नाम चमकाने का प्रयास करती हैं। भाजपा ने अतीत में आरोप लगाया है कि बंदोबस्ती विभाग द्वारा एकत्र किए गए धन- जो हिंदू मंदिरों और हिंदू धर्म के संरक्षण, संरक्षण और प्रचार के लिए है, उसे सरकार की अम्मा वोडी कल्याण योजना (माताओं को वित्तीय सहायता) के लिए दुरूपयोग किया गया था।

यह भी आरोप लगाया जाता रहा है कि अधिकारियों द्वारा धन का उपयोग आधिकारिक कारों को खरीदने, बंदोबस्ती कार्यालयों के रखरखाव आदि के लिए किया जाता है। देश भर के कई प्रमुख मंदिरों में इस तरह की कुव्यवस्थाएँ देखने को मिली हैं, और न्यायपालिका को भी यह विषय संज्ञान में लाये गए हैं। अतीत में चंद्रबाबू नायडू की सरकार पर इस तरह के आरोप लगे थे। वहीं तमिलनाडु सरकार ने भी तीन मंदिरो से 45 करोड़ रूपए लेकर वृद्ध लोगो के लिए आश्रय बनाने की अपनी योजना में उपयोग किये थे।

कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के शासनकाल में क़तील दुर्गा परमेशवरी मंदिर से धन लेकर उसे 5 मिशनरी विद्यालयों पर खर्च किया गया था। वहीं कर्नाटक सरकार ने कई हिन्दू विद्यालयों को धन देने से मन कर दिया था, यह विद्यालय गरीब और शोषित वर्ग के बच्चों को पढ़ाते थे, और इनका संचालन आरएसएस के कर्मचारी किया करते थे। अब आप सोचिए इन सरकारों और राजनीतिक दलों में हिन्दुओं के प्रति कितना द्वेष है, इन्हे हिन्दुओं द्वारा अर्जित धन तो चाहिए, लेकिन उनकी भलाई के लिए उपयोग नहीं करना चाहते।

ऐसे में सरकारों को हिन्दू मंदिरों में हस्तक्षेप बंद करना चाहिए, और उन्हें ही उनके धन का उपयोग करने का अधिकार देना चाहिए।

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