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Thursday, December 2, 2021

जेएनयू के सेंटर फॉर वीमेन स्टडीज में फिर से भारत विरोधी वेबिनार का प्रयास

भारत में कथित रूप से प्रगतिशील कहे जाने वाले और कथित “आजाद” सोच रखने वाले विश्वविद्यालय अर्थात जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में फिर से बवाल मचा हुआ है। इस बार भारत विरोधी गतिविधि का केंद्र है, सेंटर फॉर वीमेन स्टडीज। सेंटर फॉर वीमेन स्टडीज ने एंथ्रनोग्राफी ऑफ रेज़िस्टिंग डिसएपिरिएन्स, जो भारत प्रशासित कश्मीर में ऐतिहासिक लैंगिक प्रतिरोध पर एक सम्पूर्ण दृश्य प्रस्तुत करेगी और साथ ही वह वर्ष 2019 के बाद कश्मीर में जो प्रतिरोध और विरोध है, उस की मुख्य चुनौतियों पर भी एक दृश्य प्रस्तुत करेगी, पर एक चर्चा का आयोजन करने का निर्णय लिया था।

सेंटर फॉर वीमेन स्टडीज के इस वेबिनार का समाचार जैसे ही सोशल मीडिया पर आया, वैसे ही बवाल हो गया और लोग विरोध में आ गए। हालांकि बाद में सोशल मीडिया पर विरोध होने पर और आनन फानन में इस आयोजन को रद्द कर दिया गया। परन्तु एक बात बहुत हैरान करने वाली थी कि इस तस्वीर पर जेएनयू का आधिकारिक लोगो भी था।

इसके विरोध में विश्व हिन्दू परिषद के प्रवक्ता विनोद बंसल ने ट्वीट करते हुए कहा कि जेएनयू फिर से एक बार देश विरोधी ताकतों का क्षेत्र बन गया है। कश्मीर जो सृष्टि के आरंभ से ही भारत का अभिन्न अंग है और सदा रहेगा। उन्होंने कहा कि शिक्षण संस्थानों में ऐसे पाकिस्तान प्रेमियों को दूर करना चाहिए।

यद्यपि यह वेबिनार निरस्त कर दिया गया, परन्तु फिर भी लोगों के भीतर आक्रोश बहुत है और आज अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा भी विरोध प्रदर्शन किया गया। हालांकि जवाहर लाल नेहरु के उप कुलपति ने इस मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं।

इस आयोजन के समाचार को सुनते ही वीसी ने इस मामले की जाँच की बात कहते हुए इस आयोजन को निरस्त कर दिया गया।

परन्तु प्रश्न यह उठता है कि आखिर ऐसे आयोजन के विषय में सोचा ही कैसे जा सकता है और साथ ही कैसे इस आयोजन का समाचार जेएनयू प्रशासन को नहीं चल सका? और एक प्रश्न यह भी उठता है कि ऐसे वेबिनार की योजना बनती रही प्रशासन के साथ साथ, कथित रूप से वह सभी प्रोफ़ेसर भी यह नहीं पता लगा पाए कि ऐसा कोई भारत विरोधी कार्यक्रम हो रहा है, जो कथित रूप से दक्षिणपंथी या राष्ट्रवादी माने जाते हैं।

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने ऐसे प्रोफेसर्स पर भी प्रश्न उठाए कि क्यों वह समय रहते पता नहीं लगा पाए और ऐसी घटना के आधिकारिक आयोजन का निमंत्रण सोशल मीडिया पर छा गया। फिल्म निर्माता अशोक पंडित ने भी इस आयोजन के आयोजकों को स्लीपर सेल कहा और यह भी कहा कि इन स्लीपर सेल्स को गिरफ्तार करना चाहिए और कारागार में डालना चाहिए।

हालांकि इस आयोजन के निरस्त होने के बाद जेएनयू का प्रशासन लिब्रल्स के निशाने पर है। और इसे अकेडमिक फ्रीडम के विरोध की संज्ञा दे रहा है:

वहीं कुछ लोगों ने कहा कि आखिर कैसे कोई देश इतना कमजोर हो सकता है कि उसे एक वेबिनार से ही खतरा महसूस होने लगे। और फिर से अकेडमिक फ्रीडम पर हमला बता दिया।

वहीं इस विषय से एक बात समझ में आती है कि यह आयोजन भारत प्रशासित कश्मीर में महिलाओं के प्रतिरोध पर हो रहा था, तो कहीं न कहीं ऐसा प्रतीत होता है कि यह केवल और केवल भारतीय सेना और अंतत: हिन्दुओं के विरोध में ही होने जा रहा था। इस पूरे आयोजन का उद्देश्य कहीं भारतीय सेना और हिन्दुओं को स्त्री विरोधी ठहराना ही तो नहीं था, यह भी प्रश्न उठते हैं।

और यह प्रश्न उस अवधि के कारण हैं, जो इस आयोजन की धुरी थी! आखिर क्या कारण था कि इसकी अवधि को वर्ष 2019 से ही चुना गया? कश्मीर में वर्ष 2019 के बाद जो प्रतिरोध हो रहा है, उसने महिलाओं को और कश्मीर को कैसे प्रभावित किया है? क्या इस प्रतिरोध में उन महिलाओं का भी स्वर होता जिनके परिवार वाले आतंकियों का शिकार हुए हैं? या फिर यह पूरी तरह से भारतीय सेना का विरोध करते हुए अंतत: हिन्दू विरोध में परिवर्तित हो जाना था? इस प्रश्न का उत्तर अभी अनुत्तरित है? क्या इसमें मारे गए कश्मीरी पंडित बिन्द्रू जी की बेटी की पीड़ा सम्मिलित होती?

संभवतया नहीं? यही प्रतीत हो रहा है कि यह विमर्श पूर्णतया हिन्दू विरोधी विमर्श ही कहीं न कहीं था, जिसे अकेडमिक फ्रीडम का नाम लेकर आयोजित किया जा रहा था। भारत विरोधी तो था ही, पर यह स्वभाव में हिन्दू विरोधी था, क्योंकि भारतीय सेना का विरोध इसीलिए होता है क्योंकि वह कथित रूप से हिन्दू भारत से जुड़ी है।

सेंटर फॉर वीमेन स्टडीज की प्रासंगिकता!

इस पूरे प्रकरण से इतर यदि इस बात पर भी विचार किया जाए कि उस भारत में जिसमें स्त्रियों को आरम्भ से ही आदर एवं उच्च स्थान प्राप्त है, वहां पर पितृसत्ता का विष घोलकर उत्पन्न हुए स्त्री विमर्श जो मूलत: स्त्री विरोधी विमर्श है, की महत्ता की प्रासंगिकता क्या है? वीमेन स्टडीज या जेंडर स्टडीज के नाम पर भारतीय या कहें हिन्दू विमर्श और हिन्दू दृष्टि को पिछड़ा बताया जाता है और स्त्रियों को उनके परिवार और परिवार के अन्य सदस्यों के विरोध में खड़ा कर दिया जाता है। एक काल्पनिक पितृसत्ता के आसपास सिमटा यह विमर्श हिन्दू परिवार और दर्शन को छिन्न भिन्न करने के लिए पर्याप्त है।

दर्शन शास्त्र से सम्बद्ध विषयों का आधार हिन्दू दर्शन न होकर पश्चिमी दर्शन कैसे हो सकता है और वह भी वीमेन स्टडीज जैसे महत्वपूर्ण विषय का? इस तथ्य पर भी अब ध्यान देने की आवश्यकता है। क्योंकि जब तक अध्ययन में दर्शन का मूल तत्व हिन्दू नहीं होगा तब तक ऐसे विदेशी और अहिंदू विमर्श उठते ही रहेंगे!

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