वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विविध विधाओं में साहित्य लेखन एक बार को सरल दिखाई पड़ता है, किंतु समाज के प्रति दायित्वबोध की दृष्टि से किया गया लेखन दुष्कर कार्य प्रतीत होता है! ऐसे में… साहित्य क्या है, क्या नहीं है, कैसे लिखा जाए एवं क्यों लिखा जाए, सतही तौर पर सरल दिखने वाले इन विचारणीय प्रश्नों का समाधान प्रदान करती है अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री परम आदरणीय श्रीधर पराड़कर जी की पुस्तक ‘साहित्य का धर्म’ ।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद न्यास द्वारा प्रकाशित 120 पृष्ठों की इस पुस्तक में कुल 18 अध्याय हैं, एवं इसका मूल्य २०० रूपये है। अध्यायों की संख्या 18 देखकर चिरंतन सभ्यता के मनुजों को श्रीमद्भगवद्गीता का स्मरण हो आना स्वाभाविक है। वहां अर्जुन द्वारा वर्णित अवर्णित शंकाओं का समाधान श्री माधव करते हैं, तो यहां साहित्य के शिष्यों हेतु लेखक श्रीधर जी के विचार दिग्दर्शिका रूप में साहित्यिक समाधान प्रदान हैं। ‘धर्म’ शब्द के गूढ़ व वृहद अर्थ को समझते हुए लेखक ने ‘साहित्य का धर्म’ नाम चुना, वे चाहते तो साहित्य का कर्तव्य भी चुन सकते थे।
‘भारतीय ज्ञान परंपरा ‘ नामक प्रथम पुष्प में लेखक इस परम्परा पर होने वाले प्रत्येक दोषारोपण और वैचारिक आक्रमणों का अपनी धारदार लेखनी से उत्तर देते हैं, साथ ही भारतीय ज्ञान परंपरा में समिष्ट सकल तत्वों का संक्षिप्त परिचय देते हुए अल्पज्ञात बात कहते हैं कि “उपलब्ध वैदिक साहित्य संपूर्ण वैदिक साहित्य का एक छोटा सा अंश है। संकलित साहित्य का बहुत सा भाग आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया और बहुत कुछ श्रुतिपरंपरा में होने के कारण उसे धारण करने वाले व्यक्तियों के साथ विलुप्त हो गया।” लेखक आगे बताते हैं कि आज के युग में जहां एक व्यक्ति एक विषय का मास्टर्स या पी. एच.डी धारक होता हैं वहीं आत्मबोध का उद्देश्य लिए हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा के अंतर्गत एक व्यक्ति एक विषय का ज्ञाता नहीं होता था अपितु कईं विषयों पर वह विशेषज्ञ के रूप में समाज को सेवा देता था। आर्यावर्त की उपलब्धियों, विशेषताओं, आविष्कारों का गर्व से वर्णन करते हुए लेखक भारतीयों के वैभवपूर्ण जीवन का श्रेय यहां की ज्ञान परम्परा को देकर सनातनियों का हृदय जीतते दिखाई पड़ते हैं।
दूसरे पुष्प ‘साहित्य का सामर्थ्य ‘ में लेखक, साहित्य की ‘अव्यक्त’ शक्तियों को साहित्य प्रेमियों हेतु ‘व्यक्त’ करते हैं साथ ही यह बताते हैं कि किसी भी साहित्यिक कृति का प्रभाव इतना व्यापक होता है कि उसे वामपंथियों और असत्य समर्थकों के अनेक प्रयास भी क्षीण नहीं कर पाते! यहां लेखक रानी पद्मिनी के इतिहास को वामपंथियों द्वारा मिटाने के असफल प्रयत्न पर प्रकाश डालते हुए जायसी की रचना ‘पद्मिनी का जौहर’ के सामर्थ्य को रेखांकित करते हैं। ऐतिहासिक उपन्यासों की शृंखला में कन्नड़ भाषी सुप्रसिद्ध भारतीय उपन्यासकार डॉ. एस एल भैरप्पा के उपन्यास आवरण की चर्चा करते हुए लेखक योजनाबद्ध तरीके से निर्मित बौद्धिक संभ्रम को तोड़ने की सीख देकर साहित्य के आश्रय में पल रहे नवांकुरों को भारत हित में विमर्श साहित्य गढ़ने हेतु एक नई दिशा प्रदान करते हैं।
तीसरे पुष्प ‘राष्ट्रीयता और साहित्य’ में लेखक औपनिवेशिक मानसिकता पर प्रहार करते हुए कहते हैं कि राष्ट्र की वर्तमान प्रचलित अवधारणा विदेशी है। सत्य भी है … क्योंकि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भारत की नागरिकता होना राष्ट्रभक्त होने का प्रमाण नहीं होता, अन्यथा राष्ट्रद्रोह की बातों का समर्थन इसी राष्ट्र के वासी क्यों करते भला…??? इस अध्याय में लेखक एक स्थान पर अत्यंत हृदयस्पर्शी बात कहते हैं कि – “प्राचीन मनीषियों ने व्यक्ति को भावनात्मक रूप से राष्ट्र से जोड़ा था। आधार बनाया संसार के अनिवार्य व सबसे मधुर संबंध माता – पुत्र संबंध को। क्योंकि व्यक्ति पर सबसे अधिक उपकार माता के ही होते हैं।….. इसलिए कहा गया कि भूमि हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं!” लेखक ने भारतीयों के मध्य राष्ट्रीयता के भाव का समूल विनाश करने वाले तथाकथित प्रगतिशील साहित्य को भी आड़े हाथों लिया ; जिसमें राष्ट्रउद्धारक साहित्य को दुर्लक्ष्य किए जाने को लेकर लेखक की चिंता पाठक को अनुभूत होती है।
लेखक चतुर्थ अध्याय ‘साहित्य और संस्कृति ‘ में विचार के केंद्रीकरण पर ज़ोर देकर कहते हैं कि सत्ता स्वाकीयों की हो अथवा विपरीत विचारधारा रखने वालों की ; सांस्कृतिक दृष्टिकोण रखने वाले ही समाज को जीवित रखते हैं। लेखक वर्तमान समय की सर्वाधिक बड़ी विडंबना को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि हमारे देश में प्राचीन संस्कृति की बात करने पर पुनरुज्जीवनवादी या प्रतिक्रियावादी की उपाधि से विभूषित किया जाता है, किंतु इस प्रकार यूं कल्याणकारी विचारों को प्रतिक्रियात्मक कहना बौद्धिक दिवालियापन कहलाता है!! बौद्धिक दिवालियापन कहकर लेखक नवांकुरों के शब्दकोश में एक नया शब्द जोड़ते हैं। इसी के साथ लेखक यह भी कहते हैं कि संस्कृति की बात जन – जन तक पहुंचाने हेतु भाषा अपने संस्कृति की ही होनी चाहिए।
अगले पुष्प में लेखक साहित्य को ‘सामाजिक परिदृश्य ’ में लिखने की बात करते हुए कहते हैं कि “सहित्यकार की साहित्यिक योग्यता मात्र से साहित्य अच्छा नहीं होता। साहित्यकार का सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध उसके साहित्य में परिलक्षित होना अनिवार्य है।” लेखक ने साहित्य को सामाजिक परिदृश्य में लिखने को लेकर केवल सतही बातें नहीं कीं, अपितु इसी अध्याय में जानकारीप्रद विचार व्यक्त करते हुए यह बताने का प्रयास किया कि समाज हेतु कौनसा साहित्य हितकर एवं श्रेष्ठ है। यहां लेखक साहित्य नहीं अपितु लोकमंगल साहित्य लेखन पर बल देते हैं।
अगला अध्याय अत्यंत रुचिकर है क्योंकि लेखक इस अध्याय में विविध क्षेत्रों में व्याप्त विविध प्रकार के खतरों को आतंक की संज्ञा देकर उन खतरों के प्रति हमारे मानस और दृष्टिकोण शुद्धि का कार्य करते हैं। मीडिया आतंकवाद, धरना आतंकवाद, सांप्रदायिक आतंकवाद एवं साहित्यिक आतंकवाद पर अपनी पैनी कलम चलाते हुए कईं सुने – अनसुने उदाहरणों से पाठक को सभी प्रकार के आतंकवाद से सजग रहने के लिए कहते हैं। हालांकि लेखक को आतंक के पीछे ‘वाद’ प्रत्यय नहीं भाता, क्योंकि यह प्रत्यय समाजवाद और साम्यवाद के पीछे लगता है, किंतु मेरा ऐसा मानना है इन दो विचारधाराओं के परिणाम समाज व राष्ट्र का ह्रास करने वाले ही सिद्ध हुए हैं इसलिए ‘वाद’ प्रत्यय आतंक के पीछे लगाना ठीक ही बैठता है।
अगले पुष्प ‘साहित्य की चुनौतियों’ में लेखक साहित्य के समक्ष उपस्थित सभी चुनौतियों कड़े व सटीक शब्दों में वर्णन करके साहित्य अनुरागियों का ध्यान आकर्षित करते हैं व उन्हें इनका हल ढूंढने हेतु भी प्रेरित करते हैं।
‘स्वातंत्र्योत्तर साहित्यकारों का रचना संसार’ नामक अपने अगले अध्याय में जहां लेखक साहित्य के सोपानों द्वारा रचित कृतियों को पाठकों के समक्ष नवीन दृष्टिकोण से रखते हैं वहीं 8वे अध्याय में ‘अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता’ पर निशाना साधते हुए इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि नाटक वही लिखे और खेले जाते हैं जिनमें बहुसंख्यक समाज की निंदा होती है, हिंदू समाज की बुराई करने वाले ‘पोंगा पंडित’ , ‘घास कोतवाल’ जैसे नाटक तो अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता के नाम पर खेले जाते हैं परंतु मराठी नाटक ‘मी नाथूराम बोलतोय’ का न केवल विरोध किया जाता है, अपितु सरकार पर दबाव डाल कर उसे प्रतिबंधित करवा दिया जाता है।
अगले तीन अध्याय में लेखक जहां आज के साहित्यकार एवं पाठक की वर्तमान वृत्ति का वर्णन करते हैं वहीं उसमें कौनसे गुण निहित होने चाहिए यह भी बताते हैं। फूहड़ व कुत्सित इच्छाओं को जगाने वाला साहित्य न लिखा जाना न ही पढ़ा जाना चाहिए, अल्पकाल के लिए आनंददायक यह साहित्य लंबी अवधि में समाज के लिए बड़े भारी रूप में घातक सिद्ध होता है। अगले अध्याय ‘साहित्यिक परिदृश्य’ में लेखक (काकाजी) स्वयं के साथ घटित १० घटनाओं को बिना अतिरिक्त टिप्पणी किए पाठक के समक्ष रखते हैं जिससे पाठक स्वविवेक से निर्णय लेने में स्वतंत्र हैं कि किस वाकए से उन्हें क्या शिक्षा ग्रहण करनी है।
जहां आज के औपनिवेशक पृष्ठभूमि वाले विद्यालय बच्चों में अपनी सभ्यता के प्रति गर्व का भाव नहीं उलट हीन भाव उत्पन्न करते हैं वहीं बालक के उर में सही साहित्य का बीजारोपण लंबी अवधि तक सभ्यता को जीवंत बनाए रखने का कार्य करता है, बाल साहित्य के इसी महत्ता को समझाते हुए ‘बाल साहित्य में चिंतन’ नामक लेखक का अगला अध्याय सातत्य से बाल साहित्य रचने की प्रेरणा प्रदान करता है।
अगले कुछ अध्यायों में लेखक ऐतिहासिक साहित्य से समाज में नव चेतना विषय पर, लुप्त होते जा रहे संत साहित्य को पुनः मुख्यधारा में लाने पर, भाषा लिपि व बोली पर विचार रूपी प्रकाश डालते हैं।
अगले अध्याय में ‘अर्थ खोते शब्द ‘ के अंतर्गत लेखक अधिकतम लोगों के लिए अदृश्य विमर्श के महायुद्ध में प्रयुक्त होने वाले शब्दों को अत्यंत विस्तार से समझाते हैं। जिसमें गंगा जमुनी की साझा संस्कृति, भारत – इंडिया के मध्य का अंतर, स्त्री स्वातंत्र्य, स्वंतत्रता स्वच्छंदता पोंगा पंडित और भगवा आतंकवाद सहित कईं शब्दों को लेकर अपनी धारदार लेखनी से पाठकों का ज्ञानवर्धन करते हैं व सामान्य युवाओं को वैचारिक स्पष्टता प्रदान करते हैं। यह अध्याय तो प्रत्येक व्यक्ति के लिए पूर्णतः पठनीय है।
पहले गोरे व तद्नंतर भूरे साहबों द्वारा लोकजीवन एवं उसके साहित्य को कईं वर्षों तक अंधकार और अत्याचार सहना पड़ा किंतु उसे पुनः प्रकाश में लाने के लिए गत कईं वर्षों से प्रयास किया जा रहा है, इस पुस्तक का अंतिम अध्याय ‘लोक साहित्य’ भी इसी कड़ी में अपना योगदान देता है।
यह पुस्तक ठीक उसी प्रकार दिशाबोध का कार्य करती है, जैसे जीवन की कठिनाइयों से लड़ता व्यक्ति एक निशा प्रहर में जागकर कमियों का आत्मावलोकन कर रहा हो, और प्रभा आते – आते करणीय कार्य योजनाबद्ध रूप में उसके समक्ष प्रस्तुत हों, पुस्तक प्रथम अर्ध भाग उस निशा प्रहर के आत्मचिंतन समान है एवं बाकी अर्ध भाग प्रभा के पथप्रदर्शक के समान कार्य करती है । इस पुस्तक की सर्वोत्तम बात यह रही कि साहित्य के क्षेत्र में धरातल की स्थितियों का वर्णन कड़े शब्दों में किया गया। साहित्यकार को स्वयं का आंकलन सदैव – धरातल स्तर पर उसके साहित्य की पहुंच एवं प्रभाव कितना है – इस बात से करना चाहिए। इस पुस्तक से यह सीखने योग्य है।
‘साहित्य का धर्म’ प्रत्येक साहित्यकार के लिए साहित्य सृजन करते समय लागू करने योग्य योजनाबद्ध बिंदुओं का संकलन है एवं पाठक के लिए साहित्य पठन हेतु सही साहित्यिक सामग्री चयन करने का संदेश है।
ऐसे में यह पुस्तक प्रत्येक वर्ग के लिए निश्चित तौर पर पठनीय है।
— जान्हवी नाईक, रिसर्च एसोशिएट सेंटर फॉर इंडिक स्ट्डीज इंडस यूनिवर्सिटी
