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Monday, June 8, 2026

होसबोले की नासमझी पर पाकिस्तान की गीदड़भभकी

टारएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले किसकी भाषा बोल रहे हैं, क्या वे पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं, क्या वे पाकिस्तान पोषित मुस्लिम आतंकवादियों की भाषा बोल रहे हैं, क्या वे पाकिस्तान समर्थक हुर्रियत की भाषा बोल रहे हैं, क्या वे भारत विरोधियों की भाषा बोल रहे हैं?दत्तात्रेय होसबोले की पाकिस्तान वाली भाषा और बयानबाजी ने खूब तहलका मचाई है, खूब सनसनी फैलाई है, राजनीति को बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर कर दिया है, सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पाकिस्तान में भी इसकी तेज प्रतिक्रियाएं हुई है, पाकिस्तान की सेना, पकिस्तान की कूटनीति, पाकिस्तान की राजनीति ही नहीं बल्कि पाकिस्तान की आतंकी मानसिकता ने भी एक ही तरह की प्रतिक्रियाएं व्यक्त की है, सभी ने कहा है कि भारत पर दबाव है, यह दबाव वैश्विक है, वैश्विक दबाव को झेलने और प्रबंधन करने में भारत असमर्थ है, भारत कश्मीर में मानवधिकार हनन और सेना की हिंसा, उत्पीडन और संहार को ढकने, थोपने के लिए इस तरह की बयानबाजी कराई है। संघ और दत्तात्रेय होसबोले की पहचान पर भी प्रतिक्रियाएं हुई है और कहा गया है कि संघ एक हिंदूवादी संगठन है, सांप्रदायिक संगठन है, कश्मीर पर उसका दृष्टिकोण हिंदूवादी है और मुस्लिम विरोधी है, कश्मीर से मुस्लिम आबादी को पाकिस्तान भेजने और कश्मीर की मुस्लिम आबादी का संहार करने की उनकी मानसिकत विश्व स्तर पर कुख्यात है। इसलिए दत्तात्रेय होसबोले की यह बयानबाजी बहेलिए के समान है जो पक्षियों के शिकार के लिए पहले जाल बिछता है और फिर दाना डालता है। पाकिस्तान को इसमें फसना नहीं चाहिए, पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर के प्रश्न पर और भी आक्रामक होना चाहिए, मुस्लिम दुनिया की गोलबंदी करनी है, मुस्लिम देशों से भारत को होने वाली तेल और गैस की आपूर्ति रोकनी चाहिए। वास्तव में पाकिस्तान की ऐसी प्रतिक्रियाओं की वजह भी है, पाकिस्तान अभी अपने आप को विश्व शक्ति और विश्व उद्धारक समझ बैठा है। ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध मध्यस्थता कर वह अपने आप को विशेष समझ बैठा है, अमेरिका का प्यार, सहानुभूति उस पर बरस रहा है, अमरीकी डॉलर भी उसे फिर से मिलने शुरू हो गए हैं। पाकिस्तान को फिर डर किस बात का। फिर पाकिस्तान की ऐसी शेख चिल्ली तो बनती है।

दत्तात्रेय होसबोले की पाकिस्तानी बयानबाजी क्या थी? दत्तात्रेय होसबोले ने कश्मीर के प्रश्न पर संवाद जारी रखने के लिए कहा था, उन्होंने कहा था कि बातचीत चलती रहनी चाहिए, व्यापार भी चलता रहना चाहिए, वीजा की राजनीति भी चलती रहनी चाहिए, कूटनीति भी चलती रहनी चाहिए,संवाद स्थगित होने या फिर बंद होने के कारण ये सभी शांति और स्थिरता की उम्मीद बनती नहीं है। उन्होंने आगे जोडा कि संवाद के साथ ही साथ अपनी सुरक्षा की स्थितियां भी मजबूत होनी चाहिए, कश्मीर में जारी आतंकवाद को नियंत्रित रखा जाना चाहिए। सबसे पहले हमें यह देखना चाहिए कि दत्तात्रेय होसबोले को ऐसी प्रतिक्रिया देने की जरूरत ही क्यों पडी, उनकी यह बयानबाजी क्षणिक परिस्थितियों की उपज थी या फिर दीर्घकालिक राजनीति, रणनीति की हिस्सा थी? संघ अपने आप को राजनीतिक संगठन कभी नहीं कहता है, संघ कभी भी कूटनीतिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता है, सार्वजानिक तौर पर अपनी ही सरकार को ऐसी सीख देने की जरूरत ही नहीं समझता है। संघ अपने आप को सांस्कृतिक संगठन घोषित कर रखा है, दत्तात्रेय पहले ऐसे संघ के शीर्ष प्रचारक हैं जिन्होंने पाकिस्तान से संवाद स्थापित होने का समर्थन किया है। क्या दत्तात्रेय होसबोले ने अपने ही संगठन की लक्ष्मण रेखा लांघी है, तोडी है? संघ पाकिस्तान के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता है, दो धर्मों और दो देशों की थ्योरी को स्वीकार नहीं करता है। संघ अखंड भारत की बात करता है, संघ के अखंड भारत के सिद्धांत और परिधि में भारत की सीमा ईरान तक जाती है, गुलाम कश्मीर पर पाकिस्तानी कब्जा को स्वीकार नहीं करता है, पाकिस्तानी कब्जे को अवैध बताता है और गुलाम कश्मीर को वापस लेने का आकांक्षी है।

दत्तात्रेय होसबोले को क्या कश्मीर के प्रश्न पर पाकिस्तानी इतिहास नहीं मालूम है, दत्तात्रेय होसबोले को क्या पाकिस्तान की आतंकी मानसिकता नहीं मालूम है, क्या पाकिस्तान की आतंकी फैक्ट्री दत्तात्रेय होसबोले को नहीं मालूम है, क्या दत्तात्रेय होसबोले को पाकिस्तान द्वारा भारत की पीठ में छुरा घोंपने की रणनीति नहीं मालूम है, क्या दत्तात्रेय होसबोले को पाकिस्तान की काफिर मानसिकता नहीं मालूम है, क्या दत्तात्रेय होसबोले को पाकिस्तान के आतंकी संगठनों की मानसिकता और लक्ष्य नहीं मालूम है? दत्तात्रेय होसबोले को इस प्रश्न पर पाकिस्तानी इतिहास का आइना मै दिखाता हूं। जवाहरलाल नेहरू को जिन्ना पर पूरा विश्वास था, पाकिस्तान के साथ दोस्ती और संवाद की रणनीति पर चले थे, पर पाकिस्तान और जिन्ना ने नेहरू के साथ विश्वास घात किया था, नेहरू की कश्मीर पर संवाद की प्रक्रिया की अर्थी निकाल डाली थी, कबाइलियों के भेष मे पाकिस्तान की सेना ने हमला कर आधा कश्मीर पर कब्जा कर लिया, जिसे हम गुलाम कश्मीर कहते हैं। लालबहादुर शास्त्री अच्छे प्रधानमंत्री थे, उन्हें चतुराई नहीं मालूम थी, 1965 में पाकिस्तान ने फिर भारत पर हमला कर दिया, पाकिस्तान और सोवियत संघ की कारस्तानी ने शास्त्री की जान तक ले ली थी। संघ के प्रेरक पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी का प्रकरण देख लीजिए। अटल बिहारी वाजपेयी ने भी मूर्खता दिखाई थी, पाकिस्तान पर विश्वास किया था, दोस्ती का सैलाब लेकर अटल बिहारी वाजपेयी पाकिस्तान गए थे और नवाज शरीफ की चरण वंदना की थी, वाजपेई पर शांति का नोबल पुरस्कार पाने का भूत सवार था, इसलिए वाजपेई संवाद से कश्मीर समस्या का समाधान चाहते थे, दुष्परिणाम कारगिल हमला के रूप में सामने आया, कारगिल मुक्त कराने में सैकडों सैनिकों की जान गंवानी पडी थी, भारतीय अर्थव्यवस्था चैपट हुई थी। कारगिल के दुश्मन गुनहगार परवेज मुशर्रफ को वाजपेई ने फिर आगरा शांति संवाद से आमन्त्रित किया था फिर भी न संवाद बढा और न ही पाकिस्तान की आतंकी मानसिकता गई। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी तो पाकिस्तान के प्रति शरणागत थे पर पाकिस्तान ने मुम्बई हमला कर बेगुनाहों की खून की होली खेली थी। नरेंद्र मोदी ने वाजपेई की आत्मघाती संवाद की कूटनीति अपनाई और बिना बुलाए पाकिस्तान पहुंच गए, नवाज शरीफ की चरण वंदना की थी लेकिन पाकिस्तान ने पंजाब में वायुसेना छावनी पर हमला कराकर अपना आतंकी चेहरा ही स्थापित किया था। फुलवामा आतंकी हमले के बाद नरेंद्र मोदी को पाकिस्तान के साथ युद्ध करने की लाचारी सामने आई। भारत ने पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए सीमित युद्ध किया। भारत के हमलों में मारे गए आतंकियों के सम्मान और सहायता के लिए पाकिस्तान फौज डटी रही थी। ये सभी तथ्यों का विश्लेषण किया होता तो फिर दत्तात्रेय होसबोले अपनी टांग फंसाने की भूल कभी नहीं की होती।

कश्मीर में आतंकी मानसिकता नियंत्रित है, आतंकियों का संहार भी तेज गति से हो रहा है। आतंक के सौदागर और झंडेबद्दार जेलो में सड रहे हैं। हुर्रियत के आधे नेता जेलो में अपनी हिंसा और गुनाहों की सजा भुगत रहे हैं। सबसे बडी बात यह है कि आतंक के संरक्षकों और सहयोग करने वाले की गर्दन नापी जा रही है। सेना और जम्मू कश्मीर पुलिस के हौसले बुलंद है, भारतीयता समृद्ध हो रही है, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने वाले भी दुष्परिणामों से अवगत होकर खामोशी धारण कर रखे हैं। सबसे बडी बात यह है कि नरेंद्र मोदी ने धारा 370 का संहार कर एक तरह से पाकिस्तान की ही गर्दन मरोडी थी। पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खूब इधर उधर किया, मुस्लिम कार्ड खूब खेला, मुस्लिम गोलबंदी की भी पूरी कोशिश की थी, इसके लिए अफवाह भी फैलाई थी। फिर अंतर्राष्ट्रीय नियामकों ने पाकिस्तानी इच्छा पूरी नहीं की थी, मुस्लिम दुनिया भी अपने आप को पाकिस्तान पक्ष में लडने के लिए तैयार नहीं हुई थी। कहने का अर्थ यह है कि पाकिस्तान ने धारा 370 की वापसी नहीं करा सका। भारत की वर्तमान कूटनीति सही चल रही है, दुनियां भारत की जरूरत और शक्ति को स्वीकार कर चुकी है, मुस्लिम दुनिया भी भारत के साथ उलझने में अहित ही समझती है, ईरान अमेरिका युद्ध ने मुस्लिम दुनिया की एकता को उजागर कर रखा है। इसलिए भारत दबाव मुक्त है, कश्मीर पर कोई शक्ति भारत को झुका नहीं सकता है।

संवाद और आतंक एक साथ नहीं चल सकता है, कोई कमजोर देश ही ऐसा करेगा। इसी सिद्धांत को समझने में दत्तात्रेय होसबोले ने भूल कर दी है। पाकिस्तान को दो चार साल आतंक छोडकर एक सभ्य और जिम्मेदार देश के रूप में अपने आप को स्थापित करना होगा। पाकिस्तान ने कई युद्धों और आतंक के अंतहीन दौर के बाद भी कश्मीर को जीत नहीं पाया। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, इस पर कोई समझौते की उम्मीद भी नही बनती है। अगर दत्तात्रेय होसबोले गुलाम कश्मीर पर बोलते तो फिर उनकी समझ को सराहा जाता। दत्तात्रेय होसबोले अपने समर्थक वर्ग में ही अलोकप्रिय हो गए हैं, सोशल मीडिया पर तो इतना तक कहा गया कि दत्तात्रेय होसबोले पाकिस्तान के साथ संवाद का समर्थन कर महबूबा मुफ्ती सईद, फारुक अब्दुल्ला और आतंकी संगठनों के एजेंडे को आगे बढा रहे हैं, क्योंकि यही लोग पाकिस्तान परस्ती दिखाते हैं और पाकिस्तान से संवाद की बेईमानी बात करते हैं। आतंकी संगठन और पाकिस्तान तभी संवाद की बात करते हैं जब उनकी हिंसक मानसिकता कमजोर पडती है। पाकिस्तान और आतंकी संगठनों से संवाद प्रक्रिया से सेना पुलिस की हौसले गिरते हैं और आतंकी संगठनों की हिंसा सिर चढकर बोलती है।

—आचार्य श्रीहरि

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