मजहब पर आधारित आरक्षण की राजनीति संविधान विरोध है, इस पर संवैधानिक निषेध है। पहली संसद में कुछ विखंडनकारियों ने मजहब के आधार पर मुस्लिम आरक्षण की मांग की थी और विखंडन की भाषा बोली थी, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि धमकी भी दी थी कि मुस्लिम आरक्षण के बिना भारत में स्थाई शांति स्थापित नहीं होगी और समता , बराबरी का सिद्धांत लागू नहीं होगा, इत्यादि इत्यादि। ऐसी भाषा से खासकर सरदार पटेल बहुत ही पीड़ित और गुस्से में थे। सरदार पटेल आखिर क्यों नहीं पीड़ित और गुस्से में होते, उन्हें लोकतांत्रिक भारत का भविष्य खतरनाक क्यों नहीं दिखता? उनका गुस्से में होना स्वाभाविक ही था। आखिर क्यों? क्योंकि तुरंत ही भारत का विभाजन हुआ था, मजहब के आधार पर पाकिस्तान के लिए और मुस्लिम आबादी की जनसंख्या के आधार पर भरात भूमि और खजाना दे दिया गया था। भारत विभाजन के दुष्परिणाम दस लाख से अधिक हिंदुओं को गाजर मूली की तरह काट दिया गया था और लाखों हिंदुओं को तलवार के नोक पर मुस्लिम बना दिया गया था। सरदार पटेल के जवाब बहुत ही सटीक और मारक था। सरदार पटेल ने स्पष्ट कहा था कि इस्लाम के नाम पर मुस्लिम आरक्षण की मांग करने वाले मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए। उन्हें भारत में नहीं रहना चाहिए। सरदार पटेल के इस जवाब से जवाहरलाल नेहरू और मौलाना अब्दुल कलाम आजाद बहुत नाराज हुए थे और सरदार पटेल से इस पर माफ़ी की उम्मीद पाली गई थी। लेकिन सरदार पटेल ने अपने इस विचार के साथ अडिग रहे। इस कारण नेहरू की मुस्लिम आबादी को उनके मजहब के आधार पर आरक्षण देने की नीति सफल नहीं हुई थी।
मजहब के आधार पर मुस्लिम आरक्षण की मांग की राजनीति फिर सुनाई दे रही है। अवसर था संसद के अंदर महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा। संसद में महिला आरक्षण विधेयक गिर गया, पास नहीं हो सका, क्योंकि नरेंद्र मोदी की सरकार ने दो तिहाई बहुमत नहीं जुटा पाई। नरेंद्र मोदी सरकार के पास दो तिहाई बहुमत नहीं था। पर महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा के दौरान कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और टीएमसी, द्रमुक ने मुस्लिम महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग कर डाली। खासकर अखिलेश यादव ने सीधे तौर पर कह दिया कि हम इस महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि मुस्लिम महिलाओं के लिए इसमें आरक्षण की व्यवस्था नहीं है , इस विधेयक से सीधे तौर पर मुस्लिम महिलाओं के हित प्रभावित होते हैं और मुस्लिम महिलाओं की स्थिति दोयम दर्जे की हो जाएगी। कांग्रेस भी मुस्लिम महिलाओं के लिए आरक्षण की मानसिकता रखती है, उसका इस पर स्पष्ट रुझान संसद के अंदर देखा गया। इन सभी की चिन्ता यही थी कि अगर महिला आरक्षण विधेयक संसद से पास हो जाएगा तो फिर उनकी मुस्लिम और इस्लामिक राजनीति की अर्थी निकल जाएगी और सत्ता में आने की उनकी उम्मीद छिन्न भिन्न हो जाएगी। क्योंकि मुस्लिम दुनिया अपनी महिलाओं के लिए आरक्षण की मांसा रखती हैं, संसद के अंदर एकरा हुसैन ने इसे स्पष्ट भी किया था और कहा था कि हम इस महिला आरक्षण विधेयक को किसी भी स्थिति में पास नहीं होने देंगे। जिन राष्ट्रवादी लोगों ने भी संसद की बहस देखी और सुनी वे सभी लोग भारत विखंडन को फिर से याद करने लगे। यह अलग बात है कि नरेंद्र मोदी की सरकार ने मजहब के आधार पर मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण देने की मांग और मानसिकता से सहमति नहीं जताई। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कड़ाई और स्पष्ट शब्दों में कह डाला के मजहब के आधार पर मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण दिया ही नहीं जा सकता है, क्योंकि संविधान इसकी स्वीकृति नहीं देता है, ऐसी मांग संविधान विरोधी है और सांप्रदायिकता के प्रतीक हैं, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी पार्टियों ने अपनी मुस्लिम राजनीति के कारण ऐसी देश तोड़क मांग करती है, अब ऐसी सांप्रदायिक राजनीति नहीं चलेगी, देश में तुष्टिकरण की राजनीति अब मुनाफा खोरी की प्रतीक नहीं रही।
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की व्याख्या करते हुए बार बार कहा है कि मजहब के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता है और यह संविधान विरोधी है। भीमराव अंबेडकर मुस्लिम आरक्षण के विरोधी थे, उन्होंने कभी भी इसका समर्थन नहीं किया था और न हीं इस पर व्यापक चर्चा की जरूरत समझी थी। आखिर क्यों? इसके पीछे इस्लाम की परिधि है, इस्लाम कहता है कि उसके अंदर जाति नहीं है, इस्लाम में कोई ऊंच नीच का भाव और मानसिकता नहीं है, इस्लाम में सब बराबर है। जब इस्लाम में जाति की बुनियादी अवधारणा ही नहीं है तब फिर मुस्लिम आबादी को आरक्षण क्यों? आर्थिक पिछड़ापन भी आरक्षण का आधार नहीं हो सकता है। संविधान की कल्पना में धार्मिक रूप से पीड़ित और छुआछूत की शिकार जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था थी। भीमराव अंबेडकर की कल्पना थी कि हिंदू धर्म में छुआछूत है और सर्वश्रेष्ठता का भाव है, इस कारण आर्थिक और सामाजिक भेदभाव हुआ है, इसी कारण महात्मा गांधी के हरिजन और भीमराव अंबेडकर की दलित जातियां विकास की दौड़ में पिछड़ी हुई है और नर्क की स्थिति में खड़ी है, जिन्हें राज सत्ता में भागीदारी चाहिए और यह भागीदारी बिना आरक्षण का संभव ही नहीं है। इसीलिए दलितों के लिए संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। सबसे बड़ी बात यह थी कि विधायिका में आरक्षण की व्यवस्था मात्र दस सालों के लिए की गई थी। दस साल बाद आरक्षण की व्याख्या करनी थी, पर हर दस साल बाद आरक्षण की व्यवस्था समाप्त करने की जगह इसकी उम्र सीमा बढ़ती चली आ रही है। जनता पार्टी ने मंडल आयोग बना कर इसमें पिछड़ी जातियों को जोड़ दिया। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पिछड़ों के साथ ही साथ बौद्ध आदिवासियों और दलितों को भी आरक्षण दे दिया। आज कई मुस्लिम जातियां भी आरक्षण ले रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट के बार बार इनकार के बाद भी मजहब के आधार पर आरक्षण देने की राजनीति थमती नहीं है। तथाकथित गरीबी के नाम मुस्लिम आरक्षण देने के लिए कई राज्य सरकारों ने कानून भी बनाया। सबसे बड़ी बात यह है कि मुस्लिम को दलित और आदिवासी कोटे में आरक्षण देने की मांग जोड़ पकड़ी। कांग्रेस की समझ स्पष्ट हुई कि दलित और आदिवासी से मुस्लिम बने लोगों को दलित और आदिवासी मानकर उन्हें आरक्षण दिया जा सकता है। इस संबंध मे सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं डाली गई। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष बूटा सिंह ने आदिवासी और दलित कोटे से मुस्लिम आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट में सहमति जताई थी। बाद में जब हंगामा हुआ और आलोचना हुई तो बूटा सिंह ने कहा था कि हम पर पार्टी का दबाव था, उन पर कांग्रेस पार्टी और सोनिया गांधी का आदेश था। आज भी यह प्रशंग सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। रंगनाथ मिश्रा और सच्चर आयोग की विवादित रिपोर्ट को हथकंडा बनाया जा रहा है। अगर ऐसा हुआ तो फिर भीमराव अंबेडकर का सपना दफन हो जाएगा और दलितों आदिवासियों का आरक्षण मुस्लिम हड़प लेंगे, क्योंकि मुस्लिम शक्ति के सामने दलित और आदिवासी टिक नहीं पाएंगे। खासकर आदिवासी वर्ग में ईसाई आरक्षण यानी कि मजहब आधारित आरक्षण पर तनातनी है और खतरनाक स्थिति बनी हुई है।
नरेंद्र मोदी सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया और अपनी नीति से महिलाओं को प्रभावित किया है और आकर्षित किया है। मुस्लिम महिला पर आरक्षण के खिलाफ कड़ा रुख अपना कर अपना वोट बैंक मजबूत किया है। नरेंद्र मोदी तो यही चाहते हैं कि विपक्ष मुस्लिम मुस्लिम का खेल खेलता रहे ताकि उनका हिंदू वोट बैंक मजबूत होता रहे। मोदी के इस नीति के चपेट में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी, टीएमसी, द्रमुक आदि मुस्लिम समर्थक पार्टियां आ गई। निश्चित तौर पर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी टीएमसी द्रमुक आदि के लिए यह घाटे की नीति है। महिला आरक्षण के अंदर मुस्लिम महिला आरक्षण की मांग करना एक खतरनाक राजनीति है और इसे तुष्टिकरण की राजनीति कही जानी चाहिए।
— आचार्य श्रीहरि
