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Thursday, May 21, 2026

माँ भगवती की शरण में राजा भैया का शस्त्र पूजन शास्त्र सम्मत – दिव्य अग्रवाल

शिव की अर्धांग्नी शक्ति जिनको सनातनी समाज , देवी भगवती के नाम से ध्याते हैं वह भगवती , शस्त्र को अपना ही स्वरूप बताकर धर्म रक्षा की प्रेरणा देती हैं।

दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय के प्रारंभ में महाकाली के स्वरूप का वर्णन है, जिसमें उनके हाथों में शोभायमान शस्त्रों का इस प्रकार उल्लेख है:

खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः।

शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्॥

जो अपने दस हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल (त्रिशूल), भुशुण्डी, कटा हुआ मस्तक और शंख धारण करती हैं।

नारायणी स्तुति अध्याय 11 में देवी से उनके विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों के माध्यम से रक्षा की प्रार्थना की गई है।

शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।

घण्टास्वनेन न: पाहि चापज्यानि:स्वनेन च॥

हे देवि! आप अपने त्रिशूल से हमारी रक्षा करें। हे अम्बिके! आप अपने खड्ग (तलवार) से भी हमारी रक्षा करें तथा घण्टा की ध्वनि और धनुष की टंकार से भी हम सबकी रक्षा करें।

शूल-गदा स्तुति चतुर्थ अध्याय में .

“प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे।

भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरी॥”

हे चण्डिके! पूर्व, पश्चिम और दक्षिण दिशा में रक्षा करें। हे ईश्वरी! अपने त्रिशूल को घुमाकर उत्तर दिशा में भी हमारी रक्षा करें।

त्रिशूल द्वारा रक्षा का मंत्र..

ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम्।

त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते॥

ज्वालाओं के कारण विकराल, अत्यंत उग्र और समस्त असुरों का संहार करने वाला आपका त्रिशूल हमें भय से बचाए। हे भद्रकाली! आपको नमस्कार है।

शङ्खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्।

अपने हाथों में शंख, चक्र, कृपाण (तलवार) और त्रिशिख (त्रिशूल) धारण करने वाली तीन नेत्रों वाली देवी का हम ध्यान करते हैं।

नैऋत्यां खड्गधारिणी” – नैऋत्य कोण में खड्ग (तलवार) धारण करने वाली देवी रक्षा करें।

“ईश्वरी त्रिशूलं भ्रामयन्ती” – उत्तर दिशा में त्रिशूल घुमाती हुई देवी रक्षा करें।

दुर्गा सप्तशती में उक्त मंत्रो के साथ अन्य मन्त्र भी हैं जो प्रमाणित करते हैं की शस्त्र और शक्ति को पृथक नहीं किया जा सकता यदि देवी भगवती की आराधना और साधना करनी है तो वह शस्त्र बिना अपूर्ण है हाँ यह बात अवश्य है की लोकतंत्र में शस्त्र धारण करने की व्यवस्था है जिसके अंतर्गत संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करके ही शस्त्र रखा जा सकता है पर संवैधानिक शस्त्र की पूजा करना किसी प्रकार से असंवैधानिक या प्रतिबंधित नहीं है ।सनातन में शास्त्र कहता है की जिस प्रकार सनातनी स्त्री का श्रंगार , स्वर्ण और रजत आभूषण के बिना अधूरा है ठीक उसी प्रकार एक सामर्थवान पुरुष का पौरुष बिना शस्त्र के अपूर्ण है अतः देवी भगवती को अपना शस्त्र अर्पण करना उसका पूजा करना शास्त्र सम्मत है। कुंडा विधायक राजा भैया ने यदि अपने वैधानिक शस्त्र का पूजन माँ शारदा के चरणों में किया तो इसमें गलत क्या है अपितु प्रत्येक सनातनी जिसके पास वैधानिक शस्त्र हो उसका प्रथम पूजन देवी के चरणों में ही करना चाहिए ।

जो धर्म प्रहरी सनातन और मानवता की रक्षा हेतु वैधानिक शस्त्र धारण करते हैं भगवती उन पर विशेष कृपा करती हैं क्यूंकि बिना शस्त्र शक्ति के अधर्म और विधर्मियों का नाश नहीं किया जा सकता यही शिक्षा सनातन के प्रत्येक धर्म ग्रन्थ और शास्त्र ने दी है ।

— दिव्य अग्रवाल (विचारक व लेखक)

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