गुरुग्राम में खुले में नमाज के विरोध का दौर थमता हुआ नहीं दिख रहा है। और इस बार तो विरोध और भी तेज हुआ है। इस बार नागरिकों का क्रोध उस मीडिया पर फूटा है, जो हिन्दुओं को एकतरफा दोषी ठहराता रहता है। जिसकी दृष्टि में हिन्दू पिछड़े एवं कट्टर हैं और नमाज मौलिक अधिकार। नमाज एक समुदाय का धार्मिक अधिकार हो सकता है, परन्तु सामूहिक समस्या की कीमत पर नहीं। इतनी बात लोगों की समझ में नहीं आ रही है। इन्हें यह समझ नहीं आ रहा है कि खुले में नमाज का विरोध है, नमाज का नहीं!
कैसे सरकारी जमीन पर नमाज होने दी जा सकती है? यह भी प्रश्न है? कैसे सार्वजनिक भूमि को एक मजहब विशेष के लिए प्रयोग के लिए दिया जा सकता है? और कैसे एक सार्वजनिक भूमि पर ठप्पा लगाया जा सकता है? यह कुछ मूलभूत प्रश्न हैं, जिनका उत्तर हिन्दू समाज मांग रहा है, परन्तु उसे बदले में मिल रहा है असहिष्णुता का ठप्पा! बदले में उसे मीडिया के एक विशेष समूह द्वारा सबसे असहिष्णु समुदाय का ठप्पा मिलता है। ऐसे में कई प्रश्न उठ खड़े होते हैं, कि आखिर हिन्दुओं की समस्या को समझा ही क्यों नहीं जाता है? और लोगों में गुस्सा भरता जाता है।
पाठकों को याद होगा कि कैसे एनडीटीवी ने दो सप्ताह पहले एकतरफा रिपोर्टिंग करके विरोध प्रदर्शन करने वाले हिन्दुओं को कठघरे में खड़ा किया था:
उसके बाद इस बार एनडीटीवी पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा।
पत्रकार स्वाति गोयल ने एक वीडियो ट्वीट किया, जिसमें यह स्पष्ट है खुली भूमि में हवन करने वाले हिन्दू कार्यकर्ता और आम नागरिक कितने आक्रोशित हैं:
इतने सप्ताहों से चल रहा संग्राम अब एक नए मोड़ पर पहुंचा जब सेक्टर 37 में उस स्थान पर फिर से नमाज पढ़ने के लिए मुस्लिम समुदाय के लोग पहुंचे जहां पर पिछले सप्ताह क्रिकेट खेलते हुए लड़कों को भगा दिया गया था।
इस बार लोगों ने मीडिया से प्रश्न किया कि बच्चे पीटकर भगा दिए जाते हैं, उस पर मीडिया क्यों नहीं बात उठाती है। लोगों ने कहा कि मीडिया ने इस बात पर क्यों नहीं कवरिंग की थी कि बच्चों को मारकर भगा दिया था, उसे किसी मीडिया ने क्यों नहीं दिखाया?
कोई भी सेक्युलर मीडिया इस बात पर प्रश्न नहीं उठा रहा है कि आखिर सार्वजनिक स्थल को एक मजहब विशेष के लिए क्यों प्रयोग होने दिया जाए, बल्कि वह इस पक्ष में है कि उन्हें सरकारी जमीन पर नमाज पढने दी जाए! सरकारी जमीन क्या किसी हिन्दू के धार्मिक आयोजन के लिए बिना किसी शुल्क के दी जा सकती है? सरकारी जमीन को मुस्लिम नमाज के समतुल्य क्यों बनाया जा रहा है? लोगों को समस्या यह है?
यहाँ पर एक प्रश्न मीडिया से यह भी है कि वर्ष में एक बार होने वाली काँवड यात्रा पर एक बड़ा वर्ग शोर मचाता है। यही लोग हैं, जो बार बार कहते हैं कि रास्ते बाधित होते हैं, लोग चल नहीं पाते हैं, या फिर नशे में लोग यात्रा करते हैं, लड़कियों को छेड़ते हैं और काँवड यात्रा पर रोक तक लगाने की बात करते हैं, तो फिर ऐसे में नमाज के कारण प्रति सप्ताह होने वाली आम जनता की असुविधा पर यह लोग मौन क्यों हैं?
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि हर स्थान का अपना एक कार्य होता है, यदि बार बार वहां पर वही कार्य होगा तो वह उसके लिए ही निर्धारित हो जाएगी, अर्थात बिना बेचे, बिना खरीदे उस पर अतिक्रमण हो जाएगा, ऐसे में कुछ वर्षों के उपरान्त लोगों की स्मृति में वह स्थान मात्र नमाज के लिए दर्ज हो जाएगा! फिर उस पर कुछ और कार्य नहीं हो पाएगा। मीडिया और कथित सेक्युलर लोग कट्टरपंथी इस्लाम के इस हद तक गुलाम हो गए हैं कि उन्हें यह दिखाई नहीं दे रहा है!
यह नहीं दिखाई दे रहा है कि वहां पर लोग पचास किलोमीटर दूर से केवल जुम्मे की नमाज के लिए आ रहे हैं:
इसमें वह स्पष्ट कह रहा है कि वह हर सप्ताह केवल नमाज पढने के लिए ही मेवात से आता है जो 50 किलोमीटर है। यह संख्याबल के माध्यम से हर खुले स्थान पर शक्ति प्रदर्शन करना है और स्थानों पर मजहब विशेष का कब्जा स्थापित करना है।
संगत ने किया विरोध:
गुरुद्वारे में नमाज पढ़ने के प्रस्ताव का भी सिखों की ओर से ही विरोध हुआ। स्थानीय सिखों के साथ ही दिल्ली से आई संगत ने भी इस बात का विरोध किया। गुरमत प्रचार जत्था के सदस्य सरदार रवि रंजन ने इस बात का विरोध किया कि गुरूद्वारे में नमाज पढ़ी जाए। हिन्दू पोस्ट ने भी उनसे बात की तो सरदार रवि रंजन का कहना था कि गुरुद्वारे में गुरमर्यादा के अतिरिक्त कुछ नहीं होगा। उन्होंने कहा कि हर स्थान की एक मर्यादा होती है, और उसी के अनुसार वहां पर कार्य होना चाहिए।
उनका कहना था कि यह किसी की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं है बल्कि संगत की संपत्ति है।
सिख संगत ने गुरुद्वारा सिंह सभा के अध्यक्ष पर भी आरोप लगाए हैं। गुरमत प्रचार जत्था के सदस्य रविरंजन सिंह ने यह भी आरोप लगाया कि गुरुद्वारा अध्यक्ष शेरदिल सिंह सिद्धू ने गुरुद्वारे की जमीन किराए पर दे रखी है। उनका यह भी कहना है कि गुरुद्वारा अध्यक्ष का ट्रांसपोर्ट का कार्य है और उनके यहाँ पर कई मुस्लिम कार्य करते हैं, इसलिए उन्होंने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए नमाज की अनुमति दी है।
नमाज का नहीं, नमाज के बहाने अतिक्रमण और शक्ति प्रदर्शन का विरोध है और गैर-मुस्लिमों की मूल धार्मिक स्वतंत्रता के हनन के विरोध में है:
हिन्दू समाज और संगत के विरोध से दो बातें उभर कर आती हैं कि पहली तो नमाज का विरोध नहीं है। मुस्लिम समुदाय घर पर और मस्जिद में नमाज पढता है तो समस्या नहीं है, परन्तु पहचान बदलने के लिए यदि किसी स्थान का प्रयोग करता है और अंतत: उस बदली पहचान के लिए अतिक्रमण का प्रयोग करता है, वह गलत है और उसका विरोध है। जैसे जो खुले सार्वजनिक स्थान हैं, वह सभी के लिए हैं और उनकी पहचान नमाज स्थल के रूप में नहीं होनी चाहिए।
हर स्थान की एक मर्यादा होती है, उसी मर्यादानुसार कार्य होते हैं और किए जाने चाहिए!
परन्तु मीडिया इस हद तक कट्टर इस्लाम का समर्थक है कि उसे यह अतिक्रमण दिखाई नहीं देता और जनता इसी कारण आक्रोश में है! मीडिया को इस बात का विरोध है कि सार्वजनिक स्थान पर हवन करने के लिए हिन्दू क्यों पहुँच जाते हैं, परन्तु मीडिया कभी यह प्रश्न मुस्लिम समुदाय से नहीं करता कि आप लोग घर में नमाज क्यों नहीं पढ़ते? समस्या नमाज के नाम पर होने अवैध मजहबी अतिक्रमण की है और गैर-मुस्लिमों की धार्मिक स्वतंत्रता की है, जो मुस्लिम समुदाय और कट्टर इस्लाम का समर्थन करने वाला पिछड़ा मीडिया नहीं देना चाहता है!
वह छीन लेना चाहते हैं, हिन्दुओं का मूल अधिकार! उन्हें इस बात से समस्या है कि जय श्री राम का नारा क्यों लग रहा है? लोग हवन क्यों कर रहे हैं? परन्तु खुले में हर सप्ताह नमाज क्यों हो रही है, इससे समस्या नहीं है! गैर-मुस्लिमों के धार्मिक अधिकार क्या हैं, यह उन्हें नहीं समझ आ रहा है? या फिर वह समझना नहीं चाहते हैं!
