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Tuesday, October 26, 2021

कर्नाटक में अतिक्रमण के नाम पर मात्र प्राचीन मंदिरों की ही बलि!

कर्नाटक में इन दिनों भाजपा सरकार एक ऐसे मामले में घिरी हुई है, जिस मामले पर वह दूसरों को घेरती है, और शोर मचाती है. जिस मामले पर राजनीति अभी तक वह करती आई थी, और वह मामला है मंदिरों के विध्वंस का. कर्नाटक में अब मुख्यमंत्री ने मैसूर के डीसी और तहसीलदार को कारण बताओ नोटिस जारी किया है, कि मंदिर तोड़ने से पहले ग्रामीणों से बात क्यों नहीं की गयी? अब उन्होंने कहा है कि पूरे राज्यों में मंदिरों को गिराने की जल्दबाजी में फैसला नहीं लेने का निर्देश जारी किया गया है.

मामला है उच्चतम न्यायालय ने मैसूर में 93 प्राचीन हिन्दू मंदिरों को नष्ट करने का निर्णय दिया था, और इसमें कई प्राचीन मंदिर भी सम्मिलित थे. निर्णय में लिखा है कि वर्ष 2009 के बाद बने अवैध धार्मिक ढांचों को हटा दिया जाए तथा 29/09/2009 से पहले बने धार्मिक ढांचों को या तो हटाया जाए/दूसरे स्थान पर ले जाया जाए या फिर नियमित किया जाए.

धार्मिक ढांचों की बात है, मंदिरों की नहीं. परन्तु अभी तक केवल मंदिरों को ही तोडा गया है और वह भी प्रक्रिया का पालन न करते हुए. पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के नेता सिद्धारमैया ने एक ट्वीट करते हुए लिखा कि मैसूर जिले के नंजनगुड में जिस मंदिर को तोडा गया है, वह प्राचीन मन्दिर है और भाजपा सरकार को ऐसी किसी भी कार्यवाई को करने से पहले कम से कम स्थानीय लोगों से परामर्श भी करना चाहिए था. हालांकि प्रशासन का कहना है कि यह मन्दिर 12 वर्ष से पुराना नहीं था, तो स्थानीय लोगों की राय एकदम पृथक है. स्थानीय लोगों का यह स्पष्ट कहना है कि यह ग्राम देवता का मंदिर है तथा यह 80 वर्ष से अधिक पुराना है और कुछ वर्ष पहले ही इसका जीर्णोद्धार कराया गया था. गाँव वालों का कहना है कि उन्होंने यह सपने में भी नहीं सोचा था कि बिना किसी सूचना के मंदिर को इस प्रकार ढहा दिया जाएगा.

हिन्दुओं में भाजपा सरकार के इस कदम को लेकर बहुत रोष है और जनता आक्रोश में है. हिन्दू महासभा ने भी मंदिर के तोड़ने का वीडियो ट्वीट किया और आन्दोलन की बात की

हिन्दू महासभा ने ही यह आरोप लगाया कि उच्चतम न्यायालय के निर्णय को सही से समझा ही नहीं गया है और सरकार ने केवल मंदिरों की सूची बनाई है और अवैध, चर्चों, मजार और मस्जिदों को सुरक्षित रख दिया गया है.

इतना ही नहीं भाजपा के सांसद श्री प्रताप सिम्हा ही इस कदम के विरोध में उतर आए हैं और उन्होंने कहा कि अधिकारियों ने निर्णय को सही से पढ़ा नहीं और मंदिरों को निशाना बना लिया. प्रताप सिम्हा इस विषय पर काफी मुखर रहे थे और उन्होंने बार बार इस कदम का विरोध किया था. उन्होंने एक समाचार ट्वीट किया, जिसमें लिखा था कि मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने मैसूर प्रशासन से कहा है कि वह 93 मंदिरों की सूची वापस ले लें, जिन्हें कथित रूप से हटाया जाना है. इस समाचार में उनका यह वक्तव्य है कि मुख्यमंत्री ने उन्हें आश्वासन दिया है कि उन सभी 93 मंदिरों की सूची को दोबारा से जांचा जाएगा और जैसा उच्चतम न्यायालय का आदेश है कि पहले उन्हें दूसरे स्थान पर ले जाने के विकल्प पर बात करनी चाहिए और उसके बाद ही कोई कदम उठाना चाहिए.

पर मंदिर टूट गया है, और टूट रहे हैं. लोगों के मन में प्रश्न है कि अंतत: ऐसा क्यों होता है कि भाजपा जब सरकार में नहीं होती है तो मंदिर की बात करती है, परन्तु जब हिन्दू हर प्रकार का प्रयत्न करके सरकार बनवा देते हैं, तो विकास के नाम पर उन्हीं के साथ छल होता है? ऐसा क्यों? कई बार ऐसा हुआ है? हाल ही में गुजरात में, सूरत में भी एक मंदिर ढहा दिया गया था, जो कई साल पुराना था. हिन्दू संगठनों ने विरोध किया था और इतने वर्षों से पूजा करने वाले मधुभाई मावजी भाई गरनियाँ नगरपालिका अधिकारियों के सामने रोते बिलखते रहे थे, मगर उनके आंसुओं का उसी तरह कुछ असर नहीं प्रशासन पर हुआ, जैसा मैसूर में नंजनगोडू में स्थानीय नागरिकों के आंसुओं का नहीं हुआ.

जनता में आक्रोश है. टूटते हुए मंदिर प्रश्न कर रहे हैं कि अंतत: हिन्दू आस्था के साथ ही यह छल क्यों? क्यों ऐसा होता है कि हिन्दुओं के वोट लेकर उन्हें ही छलने के लिए, उनपर ही वार करने के लिए नेता आगे आ जाते हैं.

क्यों प्रशासन के हाथ पैर फूल जाते हैं अवैध मस्जिद, अवैध मजार या अवैध चर्चों पर कोई कदम उठाने में और क्यों हिन्दुओं के मंदिरों को ही ढहाने के लिए बुलडोजर पहुँच जाता है? यह दुःख है, क्योंकि हिन्दुओं में विग्रहों में प्राणप्रतिष्ठा की जाती है और जिन्हें हिन्दू जीवित मानता है, उन्हें प्रशासन मात्र एक कागज़ लेकर तोड़ने आ जाता है और वह भी पूरे दलबदल के साथ? क्या हिन्दू आस्थाओं का कोई मोल नहीं है?

हालांकि विरोध होने पर और अपनी ही पार्टी के सांसद प्रताप सिम्हा द्वारा जोरदार विरोध होने पर पुनर्विचार के लिए वह सूची जा रही है, परन्तु जैसा कि प्रताप सिम्हा ने भी कहा है कि वह मंदिर 500 वर्ष के करीब पुराना था, तो ऐसे में प्रशासन भी कैसे हिन्दुओं की आस्था के विरोध में इतना बड़ा कदम उठा लेता है?

जनता यह भी पूछना चाहती है कि रेलवे स्टेशनों पर बनी अवैध मजारों पर क्या निर्णय होते हैं? और यह भी देखना होगा कि निर्णय को गलत पढने वाले अधिकारियों पर कोई कार्यवाही होती है या नहीं? या फिर हिन्दुओं के साथ यह छल निरंतर होता ही रहेगा, चाहे सरकार कोई भी हो?

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