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Wednesday, November 30, 2022

गुरुग्राम में नमाज के लिए खोला गया गुरुद्वारा और कुछ हिन्दुओं ने ऑफर की अपनी जमीन, अपना घर! पर संभवतया मस्जिद भी वहीं है!

गुरुग्राम में अब शुक्रवार को होने वाली नमाज के चल रहे विवाद में नया मोड़ आ रहा है। इस विवाद में अब गुरूद्वारा सामने आया है और सदर बाजार गुरूद्वारे ने कहा है कि मुस्लिम चाहें तो गुरुद्वारे में आकर नमाज पढ़ सकते हैं।

गुरुद्वारा के अध्यक्ष शेरदिल सिंह ने कहा कि “यह गुरुघर है, जो सभी समुदायों के लिए बिना भेदभाव के खुला हुआ है। और इस विषय में कोई भी राजनीति नहीं होनी चाहिए। जो भी मुस्लिम भाई जुम्मे की नमाज पढना चाहते हैं, उनके लिए गुरूद्वारे का बेसमेंट खुला है। और उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई खुली जगह है तो मुस्लिमों को नमाज पढने देना चाहिए और हमें इन छोटे मोटे मामलों में नहीं पड़ना चाहिए। जो लोग खुले में नमाज पढने का विरोध कर रहे हैं, उन्हें पहले प्रशासन से बात करनी चाहिए और फिर ही उन पर हमला करना चाहिए!

यह ट्वीट आज गुरूवार को आया है, जब कल फिर से जुम्मे की नमाज का दिन है।

हालांकि एक यूजर ने ट्वीट करते हुए कहा कि यह पूरी तरह से राजनीतिक कदम है क्योंकि विवाद वाले स्थान से यह गुरुद्वारा दो किलोमीटर दूर है और गुरुद्वारे के पांच मिनट की दूरी पर ही मस्जिद है। और गुरूद्वारे जाने के लिए लोगों को मस्जिद से होकर गुजरना होगा।

यह पूरा मामला खुले में नमाज पढने का था, और अब इसे ट्विस्ट देकर नमाज का विरोधी बताया जा रहा है। गुरुग्राम में कई स्थानों पर लोगों ने इस बात का विरोध किया था कि सार्वजनिक स्थानों पर नमाज क्यों पढी जा रही है?

सार्वजनिक स्थानों पर नमाज, क्या कोई मजहबी मामला है या फिर कुछ और? क्योंकि किसी ने नमाज का विरोध नहीं किया है, सार्वजनिक स्थानों पर नमाज का विरोध किया है। इस विषय में कश्मीरी एक्टिविस्ट डॉ दिलीप कुमार कौल “अतिक्रमण” के विषय में बहुत ही विस्तार से बताते हैं। उन्होंने urban pandit नामक यूट्यूब चैनल में उन्होंने इस अतिक्रमण के इतिहास को बताया था। उन्होंने कहा कि मिशनरीज़ के माध्यम से हमारे मस्तिष्क में पहले अतिक्रमण किया गया। उन्होंने कहा कि हमारे दिमाग के साथ खेला जाता है। फिर उन्होंने सूफियों का उदाहरण देते हुए कहा कि सूफियों ने कुछ हिन्दुओं से लिया, कुछ उधर से लिया और फिर स्वयं को उन्होंने यह प्रमाणित कर दिया कि सूफी तो बहुत अच्छे हैं, अर्थात मुस्लिम तो बहुत अच्छे हैं, परन्तु जब तलवार से हमला हुआ तो सूफी पीछे हट जाता है। दिलीप कौल का कहना है कि ईसाइयों ने जब हमारे दिमाग पर अतिक्रमण किया, तो उससे पहले ही हमारे दिमाग पर इस्लामी अतिक्रमण हो चुका था।

फिर उन्होंने अतिक्रमण का वह आयाम समझाया जो गुरुग्राम में हो रहा है और जिसका विरोध वहां के हिन्दू कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक नमाज का अर्थ क्या होता है? उन्होंने कहा कि जो पब्लिक स्पेस को फिल करता है, वही उसे मीनिंग देता है।

उन्होंने कहा कि हिन्दुओं ने मंदिर को पब्लिस स्पेस से अलग रखा। फिर उन्होंने गुरुग्राम में पिछले सप्ताह हुई उस घटना का उल्लेख किया, जिसके कारण सबसे अधिक बवाल मचा था कि हिन्दू कार्यकर्ताओं ने उस सार्वजनिक स्थान पर जहाँ नमाज पढ़ी जाती थी, वहां पर कंडे डाल दिए थे।

अर्थात हिन्दुओं ने उस स्थान को फिल कर दिया कि हम इस स्थान को अपने पशुओं के लिए प्रयोग करेंगे।

इस वीडियो में उन्होंने अतिक्रमण और नमाज के माध्यम से किए जा रहे मजहबी अतिक्रमण के विषय में बताया था। परन्तु ऐसा लगता है जैसे या तो लोग नहीं समझते हैं या समझना नहीं चाहते हैं, कि सार्वजनिक स्थान पर नमाज से क्या परेशानी होती है। जब मीडिया का एक बड़ा वर्ग इसे समस्या ही न मानना चाहे तो ऐसे में कई समाचार ऐसे आते हैं, जो इस अतिक्रमण के कई और आयाम बताते हैं, जैसे राजस्थान से आया यह समाचार कि एक चलती हुई बस को केवल एक यात्री के नमाज पढ़े जाने के कारण आधे घंटे तक रोका गया।

उसमें बैठे हुए तीन दर्जन यात्री परेशान हुए और फिर रोडवेज के कंट्रोल रूम में भी शिकायत की।

क्योंकि मीडिया और लेखकों का एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जिनके लिए वह तीन दर्जन लोग मायने नहीं रखते हैं, केवल उस एक व्यक्ति का मजहबी अधिकार मायने रखता है, इसलिए वह उसी आदमी के साथ खड़े होंगे, बजाय उन तीन दर्जन लोगों के, जो एक आदमी के मजहबी अतिक्रमण का शिकार हो रहे हैं।

गुरुग्राम में तो गुरूद्वारे, हिन्दू व्यापारी और साथ ही राहुल देव जैसे पत्रकार सामने आ रहे हैं, जो अपनी संपत्ति को नमाज के लिए दे रहे हैं या फिर दिए जाने की पेशकश कर रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने भी जनता को होने वाली समस्याओं पर आवाज नहीं उठाई बल्कि सार्वजनिक स्थल पर नमाज न पढने देने को गलत ठहराया। और यहाँ तक लिख दिया कि मैं गुरुग्राम में ही रहता हूँ लेकिन जहाँ नमाज़ हो रही थी या विरोध हो रहा था उन जगहों से काफ़ी दूर। पास होता तो निश्चय ही अपना घर नमाज़ के लिए खोलता। मेरे घर में नमाज़ होगी तो वह पवित्र ही होगा। जिन कारणों-तरीकों से विरोध हो रहा था वे गहरी पीड़ा दे रहे थे।

इस पर लेखक एवं दूरदर्शन में दो टूक कार्यक्रम के एंकर अशोक श्रीवास्तव ने उनसे प्रश्न करते हुए ट्वीट किया कि

आपका घर आपकी संपति है सर आप उसे बिल्कुल 5 वक्त की नमाज़ के लिए खोल दें किसी को कोई हक नहीं इस विषय में बोलने का,लेकिन सड़कें,पार्क इबादत करने की जगह नहीं इसका विरोध गलत कैसे हो सकता है ?

राहुल देव को उत्तर देते हुए एक और हैंडल ने लिखा

कि 700 वर्ष पहले मेरे पूर्वजों ने भी नमाज के लिए कुछ मुस्लिमों के लिए अपने दरवाजे खोले थे, और शेष इतिहास है!

गुरुग्राम में जहाँ गुरूद्वारे जुम्मे की नमाज के लिए स्थान दे रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर एक चित्र वह भी है जिसमें अफ्गानिस्तान से बचकर आए सिख गुरुग्रंथ साहिब के साथ खड़े हैं:

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वहीं कुछ दिन पहले की यह रिपोर्ट भी मुंह चिढ़ा रही है, कि तालिबान ने अफगानिस्तान के सिखों को इस्लाम अपनाने या जाने के लिए कहा

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अतिक्रमण को न समझने की मानसिकता कहाँ जाकर रुकेगी, यह देखना होगा!

पर प्रश्न यह है कि क्या कभी मस्जिद में ऐसी सहिष्णुता दिखाई देगी?

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